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हापुड़ में सीओपीडी मरीजों की संख्या बढ़ी, बचाव के लिए प्रदूषण नियंत्रण जरूरी

cy520520 2025-11-7 01:37:45 views 857
  



जागरण संवाददाता, हापुड़। हापुड़ में बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण लोग सीओपीडी (क्रानिक आब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) जैसी घातक बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। पिछले दस दिनों में इस बीमारी से ग्रस्त मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। यह मरीज जिला अस्पताल और सीएचसी में पहुंचे हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

पहले केवल यह ही माना जाता था कि लोगों को सीओपीडी की बीमारी धूम्रपान करने से होती है, लेकिन ऐसा नहीं है। वायु प्रदूषण के स्तर बढ़ने से भी यह रोग तेजी से बढ़ रहा है। चिकित्सक इसे गंभीर मामला मानकर चल रहे हैं।

पिछले दिनों में प्रदूषण लगातार बेहद खराब श्रेणी में चल रहा है। जिसके कारण जहरीले तत्व हमारे फेफड़ों और श्वास प्रणाली को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जिसके कारण लोगों में सीओपीडी के लक्षणों के साथ-साथ यह बीमारी फैल रही है। सीएचसी में तैनात फिजीशियन डा. अशरफ अली ने बताया कि सीओपीडी में फेफड़े में एक काली तार बन जाती है। यह अस्थमा के दमा से अलग होता है। अस्थमा एलर्जी प्रकार का रोग होता है, जो वंशानुगत और पर्यावरण कारकों के मेल द्वारा होता है।

उन्होंने बताया कि सीओपीडी होने पर इतनी खांसी आती है कि फेफड़ा बढ़ जाता और रोगी चलने लायक नहीं रहता। यहां तक कि मुंह से सांस छोड़ना पड़ता है। इस रोग का सबसे बड़ा कारण पहले धूम्रपान माना जाता था, लेकिन अब वायु प्रदूषण के कारण भी यह रोग धूम्रपान न करने वालों में भी हो रहा है।
तीन प्रकार के होती हैं सीओपीडी

डा. अशरफ अली ने बताया कि सीओपीडी तीन प्रकार की होती है, माइल्ड सीओपीडी, जिसमें खांसी में बलगम आने के साथ ही सांस फूलता है। मोडरेट सीओपीडी में इन दोनों लक्षणों के साथ छाती में इंफेक्शन को ठीक होने में कई सप्ताह लग जाते हैं। सीवियर सीओपीडी में इन तीनों लक्षणों के अलावा बैठे हुए भी सांस फूलने लगता है।
सीओपीडी के प्रमुख लक्षण

  • लंबे समय तक बलगम वाली खांसी
  • सांस की कमी महसूस होना
  • छाती में घरघराहट
  • छाती में जकड़न

इस प्रकार कर सकते हैं बचाव

धूम्रपान न करें, घरों में चूल्हे, अंगीठी और स्टोव का प्रयोग न कर गैस चूल्हे का प्रयोग करें। वायु प्रदूषण रोकने के प्रयास करें, कूड़े को जलाने की आदत को बदलें। फेफड़ों को नुकसान से बचाने के लिए धूम्रपान छोड़ दें। नियमित रूप से जांच कराएं। श्वांस संबंधी व्यायाम करें। नियमित पैदल चलें। स्वस्थ और सेहतमंद बनाने वाला भोजन करें।
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