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पटना से मेटल किंग तक अनिल अग्रवाल का सफर, बेटे अग्निवेश की मौत से टूटा परिवार; टिफिन–बिस्तर से लंदन स्टॉक एक्सचेंज तक की कहानी

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इकलौते बेटे अग्निवेश अग्रवाल का 49 वर्ष की उम्र में अमेरिका में निधन  



डिजिटल डेस्क, पटना। पटना की गलियों से निकलकर दुनिया के मेटल कारोबार पर छाप छोड़ने वाले वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल आज फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह उनकी कारोबारी उपलब्धियां नहीं, बल्कि उनके जीवन का सबसे गहरा निजी आघात है। उनके इकलौते बेटे अग्निवेश अग्रवाल का 49 वर्ष की उम्र में अमेरिका में निधन हो गया। इस दुखद घटना ने उस शख्स की जिंदगी के दो छोर एक साथ सामने ला दिए हैं, एक तरफ सफलता, संघर्ष और साम्राज्य की कहानी, दूसरी तरफ एक पिता का टूटता दिल।


अनिल अग्रवाल ने खुद सोशल मीडिया पर बेटे के निधन की जानकारी देते हुए लिखा, \“आज मेरे जीवन का सबसे अंधकारमय दिन है। वे सिर्फ मेरे बेटे नहीं, मेरे दोस्त, मेरा गौरव और मेरी दुनिया थे।\“ यह बयान सिर्फ एक पिता का शोक नहीं, बल्कि उस इंसान की भावनात्मक परतों को भी दिखाता है, जिसे देश ‘मेटल किंग’ के नाम से जानता है।
पटना से शुरू हुई कहानी

अनिल अग्रवाल का जन्म 1954 में पटना के एक मध्यमवर्गीय मारवाड़ी परिवार में हुआ। परिवार की जड़ें राजस्थान में थीं, लेकिन पिता द्वारका प्रसाद अग्रवाल रोज़गार के सिलसिले में बिहार आ बसे थे।

पटना में उनकी एक छोटी-सी एल्यूमिनियम कंडक्टर की दुकान थी। आमदनी सीमित थी, परिवार बड़ा था और संसाधन बेहद कम।


अनिल की शुरुआती पढ़ाई सरकारी स्कूल में हुई। उस दौर में बड़े सपने देखना आसान नहीं था, लेकिन पिता को मेहनत करते देख उन्होंने कम उम्र में ही यह समझ लिया कि व्यापार ही उनकी दुनिया है।

पढ़ाई के बाद उन्होंने आगे बाहर जाने के बजाय पिता के कारोबार में हाथ बंटाना चुना।
19 साल की उम्र में बड़ा फैसला

कुछ साल पिता के साथ काम करने के बाद अनिल अग्रवाल के भीतर बेचैनी बढ़ने लगी। उन्हें लगने लगा कि अगर बड़ा कुछ करना है, तो पटना से बाहर निकलना होगा। महज 19 साल की उम्र में उन्होंने मुंबई जाने का फैसला किया।


मुंबई पहुंचते वक्त उनके पास न पूंजी थी, न कोई मजबूत नेटवर्क। सिर्फ एक टिफिन बॉक्स, एक बिस्तर और ढेर सारे सपने थे। उन्होंने तय किया कि नौकरी नहीं करेंगे, बल्कि अपना ही काम खड़ा करेंगे।
असफलताओं का लंबा दौर

मुंबई में अनिल अग्रवाल के शुरुआती साल संघर्ष और असफलताओं से भरे रहे। उन्होंने एक-दो नहीं, पूरे 9 अलग-अलग बिजनेस शुरू किए, कभी स्क्रैप का कारोबार, कभी छोटे स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग, लेकिन हर बार नाकामी हाथ लगी।


खुद अनिल अग्रवाल ने बाद में स्वीकार किया कि उनके शुरुआती 30 साल संघर्ष में बीते। कई बार वे डिप्रेशन में भी रहे। पैसों की कमी ऐसी थी कि कर्मचारियों की सैलरी और कच्चा माल खरीदने के लिए बैंकों के चक्कर काटने पड़ते थे।


इसी दौर में उन्होंने मुंबई में एक छोटा सा घर लिया और पत्नी किरण अग्रवाल को साथ बुलाया। वे अकसर कहते हैं कि उनकी पत्नी ने उस छोटे से मकान को \“घर\“ बना दिया और मुश्किल समय में उनका सबसे बड़ा सहारा बनीं।
वेदांता की नींव

1976 वह साल साबित हुआ, जिसने अनिल अग्रवाल की किस्मत की दिशा बदल दी। इसी साल उन्होंने वेदांता रिसोर्सेज की स्थापना की। शुरुआत में यह एक छोटा कदम था, लेकिन इस बार हालात अलग थे, बिजनेस में मुनाफा होने लगा।


अनिल अग्रवाल ने इस मुनाफे का इस्तेमाल विस्तार और अधिग्रहण में किया। 1993 में औरंगाबाद में एल्यूमिनियम शीट और फॉइल्स का प्लांट लगाया। इसके साथ ही वेदांता भारत की पहली निजी कॉपर रिफाइनरी कंपनी बन गई।


धीरे-धीरे वेदांता का नाम मेटल सेक्टर में मजबूती से स्थापित होने लगा।
सरकार के फैसले ने बनाया ‘मेटल किंग’

अनिल अग्रवाल के जीवन का टर्निंग पॉइंट 2001 में आया। उस समय भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में निजी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया।

वेदांता ने भारत एल्युमिनियम कंपनी (BALCO) में 51% हिस्सेदारी खरीदी। अगले ही साल हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में 65% हिस्सेदारी ले ली।

जब ये सौदे हुए, तब दोनों कंपनियों की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। लेकिन माइनिंग सेक्टर की गहरी समझ और आक्रामक रणनीति ने वेदांता को जबरदस्त फायदा दिलाया। यहीं से अनिल अग्रवाल ‘मेटल मैन’ और फिर ‘मेटल किंग’ कहलाने लगे।
लंदन तक पहुंचा पटना का सपना

2001 में स्टरलाइट इंडस्ट्रीज शेयर बाजार से जुड़े एक विवाद में फंस गई। सेबी ने कंपनी को कैपिटल मार्केट से बैन कर दिया। यह दौर किसी भी उद्योगपति के लिए घातक हो सकता था।


लेकिन अनिल अग्रवाल ने हार नहीं मानी। 2003 में वे लंदन चले गए और कंपनी को नए सिरे से वेदांता रिसोर्सेज के नाम से खड़ा किया। उसी साल वेदांता को लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट कराया।


यह पहली बार था जब कोई भारतीय कंपनी LSE में सूचीबद्ध हुई। इस लिस्टिंग से अनिल अग्रवाल को करीब 7 हजार करोड़ रुपये का फायदा हुआ और उनका बिजनेस सचमुच ग्लोबल बन गया।
अरबों का साम्राज्य, हजारों करोड़ का टैक्स

आज वेदांता जिंक, लेड, एल्युमिनियम और सिल्वर उत्पादन में दुनिया की अग्रणी कंपनियों में शामिल है। कंपनी का मार्केट कैप करीब 83 हजार करोड़ रुपये है।


फोर्ब्स की जुलाई 2025 की लिस्ट के मुताबिक, अनिल अग्रवाल की कुल संपत्ति करीब 35 हजार करोड़ रुपये है। वे बिहार के सबसे अमीर व्यक्ति बन चुके हैं। हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2025 में वे 16वें स्थान पर हैं।


अनिल अग्रवाल अक्सर कहते हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक साधारण आदमी होते हुए राष्ट्र निर्माण में इतना बड़ा योगदान देंगे। बीते 8 वर्षों में वेदांता ने 3.39 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा टैक्स सरकार को दिया है।
बेटे अग्निवेश: उम्मीदों का चेहरा

अनिल अग्रवाल के इकलौते बेटे अग्निवेश अग्रवाल का जन्म 3 जून 1976 को पटना में हुआ था। उन्होंने अजमेर के प्रतिष्ठित मेयो कॉलेज से पढ़ाई की। खेल, संगीत और नेतृत्व, तीनों में उनकी गहरी रुचि थी।


अग्निवेश ने वेदांता समूह में कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं। वे हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के चेयरमैन रहे और तलवंडी साबो पावर लिमिटेड के बोर्ड सदस्य थे। इसके अलावा यूएई की फुजैराह गोल्ड कंपनी में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।


उनकी शादी श्री सीमेंट समूह की उत्तराधिकारी पूजा बांगुर से हुई थी। यह शादी उस दौर की सबसे भव्य और चर्चित शादियों में गिनी जाती है।
अमेरिका में हादसा और असमय अंत

कुछ समय पहले अमेरिका में स्कीइंग के दौरान अग्निवेश गंभीर रूप से घायल हो गए थे। न्यूयॉर्क के माउंट सिनाई अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था और परिवार को उम्मीद थी कि वे जल्द स्वस्थ हो जाएंगे।


लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। अचानक कार्डियक अरेस्ट से उनका निधन हो गया। इस खबर ने न सिर्फ वेदांता समूह, बल्कि पूरे कारोबारी जगत को झकझोर दिया।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत देश-विदेश की कई बड़ी हस्तियों ने शोक जताया।
टूटे पिता, अधूरी विरासत

बेटे की मौत के बाद अनिल अग्रवाल ने लिखा कि वे अपनी कमाई का 75% समाज को लौटाने के अपने वादे को निभाएंगे। यह वादा उन्होंने बेटे से किया था।


आज अनिल अग्रवाल के पास अरबों का साम्राज्य है, लेकिन बेटे के जाने से उनके जीवन में जो खालीपन आया है, उसे कोई संपत्ति भर नहीं सकती।


पटना में जन्मे उस साधारण लड़के की कहानी, जिसने टिफिन और बिस्तर के सहारे मुंबई जाकर दुनिया के मेटल बाजार पर राज किया—आज उसी कहानी के बीच एक गहरी पीड़ा जुड़ गई है।

यह सिर्फ एक उद्योगपति की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, सफलता और अंततः मानवीय संवेदनाओं की कहानी है।
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