पराली की मदद से रोज 10 हजार कमा रहा ये किसान
नई दिल्ली। भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां धान की खेती भी बड़ी मात्रा में होती है। मगर धान की कटाई के बाद बच जाने वाली पराली एक समस्या रही है। बहुत से किसान इसे जलाकर खत्म करते रहे हैं, मगर इससे प्रदूषण फैलता है। पर अब पराली कमाई का जरिया बन रही है। जी हां, छत्तीसगढ़ के किसान राजेंद्र कुमार साहू ने पराली की चुनौती को सुनहरे अवसर में बदल दिया है और वे इससे कमाई कर रहे हैं। आइए जानते हैं कैसे।
कैसे हो रही कमाई?
राजेंद्र ने तीन विषयों में MA की हुई है। अब वे पराली को जलाते नहीं हैं, बल्कि उसका इस्तेमाल ऑर्गेनिक \“पैडी स्ट्रॉ मशरूम\“ उगाने के लिए करते हैं। अच्छी शिक्षा के साथ उन्होंने नौकरी के बजाय खेती का रास्ता चुना। सन 2005 में उन्होंने ऑयस्टर मशरूम से शुरुआत की। फिर उन्हें पता लगा कि पैडी स्ट्रॉ मशरूम की मांग बहुत ज्यादा है। कीमत भी काफी ज्यादा है, जिससे अधिक मुनाफे की उम्मीद है।
इसी लक्ष्य के साथ वे ओडिशा से बीज (स्पॉन) लाए और शुरुआत की। धीरे-धीरे ही सही, मगर राजेंद्र ने अपने इस काम में महारत हासिल कर ली।
क्या तकनीक अपनाई?
राजेंद्र ने सबसे अहम काम किया प्रेशर कुकर और स्पिरिट लैंप जैसे घरेलू सामानों से हाई क्वालिटी वाले \“स्पॉन\“ तैयार करना। इसके नतीजे में वे स्पॉन को लेकर आत्मनिर्भर हो गए। उन्होंने महंगे शेड के बजाय प्रकृति की मदद से आम के पेड़ों के नीचे वर्टिकल स्टैंड पर मशरूम बेड बनाए।
पेड़ों की छाया से तापमान 10 डिग्री कम रहा और नमी भी अच्छी रही। नतीजे में इस \“माइक्रो-क्लाइमेट\“ के चलते मार्च से अक्टूबर तक भी मशरूम का काफी उत्पादन हो रहा है।
मिल चुका है राष्ट्रीय पुरस्कार
राजेंद्र \“जीरो वेस्ट\“ मॉडल पर खेती करते हैं। जब मशरूम का उत्पादन होता है, तो वे पराली की वेस्ट डीकंपोजर के जरिए जैविक खाद बना देते हैं। इसे वह खेतों में भी इस्तेमाल करते या दूसरे किसानों को भी देते हैं। अपनी इस सफलता के लिए वे 2019 में राष्ट्रीय पुरस्कार भी हासिल कर चुके हैं।
रोज कितनी हो रही कमाई?
राजेंद्र 2,000 मशरूम बेड के साथ रोजाना लगभग 50 किलो मशरूम उगाते हैं और 270 से 300 रुपये प्रति किलो तक में बेच देते हैं। एक बेड की लागत 70-80 रुपये है। इससे वे रोज 10,000 रुपये का मुनाफा कमाते हैं।
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