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क्या ट्रंप के H-1B वीजा बम से मिलेगी भारतीयों को राहत? फैसले के खिलाफ कोर्ट पहुंचा US चैंबर ऑफ कॉमर्स

cy520520 2025-10-17 13:37:30 views 1234
  

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप। (फाइल फोटो- रॉयटर्स)



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने हाल के दिनों में लिए गए फैसलों में सबसे अधिक चर्चा H-1B वीजा की रही। राष्ट्रपति ट्रंप ने H-1B वीजा आवेदन के लिए $100,00 सालाना फीस लगाने का फैसला लिया। इस बीच US चैंबर ऑफ कॉमर्स ट्रंप के इस फैसले को कोर्ट में चुनौती देने जा रहा है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया था कि इस फैसले से अमेरिका की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत होगी। अब ट्रंप के इस फैसले असर भी देखने को मिलने लगा है। कई कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को ये वीजा देना बंद कर दिया है। जिससे कई लोगों पर सीधा असर पड़ा है।
ट्रंप के फैसले के खिलाफ कोर्ट पहुंचा US चैंबर ऑप कॉमर्स

US चैंबर ऑफ़ कॉमर्स ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन पर केस करने की तैयारी में है। इस चैंबर ने दावा किया है कि यह फीस गैर-कानूनी है और इससे US व्यवसाय को काफी नुकसान होने की संभावना है।

बता दें कि गुरुवार को वाशिंगटन डीसी में फाइल किए एक फेडरल केस में चैंबर ने कोर्ट से कहा कि वह यह घोषित करे कि प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने फीस लगाकर एग्जीक्यूटिव ब्रांच के अधिकार का उल्लंघन किया है और फेडरल सरकारी एजेंसियों को इसे लागू करने से रोक दिया है।

अमेरिका में मिलने वाला H-1B वीजा हाई स्किल्ड नौकरियों के लिए जिन्हें टेक कंपनियों को भरना मुश्किल लगता है। बता दें कि भारत के लोग सबसे अधिक इस वीजा का उपयोग करके अमेरिकी में नौकरी करते हैं।
ट्रंप प्रशासन के खिलाफ किए गए केस में क्या कहा गया?

  • US चैंबर ऑफ कॉमर्स का कहना है कि एच-1बी वीजा की ये नई फीस इमिग्रेशन कानूनों का उल्लंघन करती है। जिसमें यह शामिल करने की आवश्यकता है कि फीस पर सरकार द्वारा वीजा प्रक्रिया को पूरा करने में किए गए खर्च के आधार पर तय किए जाए।
  • कोर्ट में दाखिल किए गए केस में कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास यूएस में गैर-नागरिकों की एंट्री पर काफी अधिकारी है, लेकिन यह अधिकार कानून से बंधा हुआ है और इसका उल्लंघन करने का अधिकार किसी के पास नहीं है। इस चैंबर के अनुसार, ट्रंप के नई फीस लगाने के एलान से पहले, अधिकांश H-1B वीजा आवेदन की कीमत $3,600 से कम थी।
  • कोर्ट में दायर किए गए केस में कहा गया कि अगर इसे लागू किया जाता है, तो यह फीस अमेरिकी बिज़नेस को काफी नुकसान पहुंचाएगी, जिन्हें या तो अपनी लेबर कॉस्ट बहुत ज़्यादा बढ़ानी पड़ेगी या कम हाई स्किल्ड कर्मचारियों को काम पर रखना होगा जिनके लिए घरेलू रिप्लेसमेंट आसानी से उपलब्ध नहीं होंगे।


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