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India-US Trade Pact: ऊर्जा आयात आज़ाद, भारत को मिलेगा बाज़ार का फायदा!

deltin55 Yesterday 22:40 views 57


फरवरी 2025 में लॉन्च हुए इस व्यापार समझौते के ढांचे का ऐलान फरवरी 2026 में हुआ है, जो भारत और अमेरिका के आर्थिक रिश्तों में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। इसका मकसद व्यापार को सुगम बनाना और भारतीय निर्यातकों के लिए बाज़ार तक पहुंच को आसान बनाना है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविधतापूर्ण बनाने की दिशा में लगातार काम कर रहा है, जो उसकी लंबी अवधि की आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा है।





India-US अंतरिम व्यापार समझौते के ऐलान से भारतीय वित्तीय बाज़ारों में जोश है। फरवरी 2026 की शुरुआत में, प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी पिछले दिनों की बढ़त को जारी रखते हुए ऊपर कारोबार कर रहे थे, जिसका श्रेय विदेशी फंडों की आमद और इस डील को लेकर सकारात्मक भावना को जाता है। 6 फरवरी 2026 को BSE सेंसेक्स करीब 83,580 अंकों पर था, जबकि जनवरी 2026 के अंत में Nifty 50 लगभग 26,328 पर बंद हुआ था। हालांकि, बाज़ार में यह तेजी बाज़ार पहुंच और संभावित भू-राजनीतिक बाधाओं के बीच संतुलन को लेकर छिपी चिंताओं के साथ आई है। ऊर्जा और सामग्री (materials) जैसे सेक्टरों ने 2026 की शुरुआत में अच्छा प्रदर्शन दिखाया है, जो भारत के ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास पर जोर देने के अनुरूप है। वहीं, USD/INR एक्सचेंज रेट 2026 में 89 के आसपास रहने का अनुमान है, जो वैश्विक आर्थिक ताकतों और घरेलू नीतियों के बीच एक नाजुक संतुलन को दर्शाता है।



केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का यह कहना कि भारत के ऊर्जा आयात के फैसले, खासकर रूसी कच्चे तेल के बारे में, व्यापार समझौते से स्वतंत्र हैं, एक जटिल भू-राजनीतिक रणनीति को उजागर करता है। यह अलगाव (decoupling) भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करने की इजाजत देता है, जबकि अमेरिका के साथ गहरे आर्थिक संबंध भी विकसित कर सकता है। यह दृष्टिकोण दुनिया के अन्य प्रमुख देशों से अलग है, जहां ऊर्जा नीति अक्सर व्यापार प्रतिबंधों से सीधे जुड़ी होती है। विश्लेषकों की राय बंटी हुई है; कुछ का मानना है कि अमेरिकी वस्तुओं के लिए $500 बिलियन का वादा एक ठोस व्यापार अनुमान से ज़्यादा एक राजनीतिक नारा है। मूडीज (Moody's) का कहना है कि रूस से तेल के आयात में अचानक बंदिश आर्थिक नतीजों के कारण मुश्किल है, जिससे वैश्विक तेल की कीमतें और महंगाई बढ़ सकती है। ऐतिहासिक रूप से, तेल की कीमतों में झटकों के प्रति भारत की संवेदनशीलता में बदलाव आया है, लेकिन अपने व्यापार संतुलन को बेहतर बनाए रखने के लिए विविधीकरण (diversification) महत्वपूर्ण है, जिसका FY27 के लिए 0.8% GDP रहने का अनुमान है। भारत के FY26 के लिए 7.4% GDP ग्रोथ के मजबूत अनुमान और दुनिया भर में इसके विविध व्यापारिक साझेदार इन रणनीतिक कदमों के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं।



सकारात्मक तस्वीर के बावजूद, India-US अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे में महत्वपूर्ण जोखिम और बाधाएं शामिल हैं। विश्लेषकों का कहना है कि "आर्थिक सुरक्षा संरेखण" (economic security alignment) पर जोर देने से भारत की आर्थिक नीतियां अमेरिकी भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं से बंध सकती हैं, जिससे तीसरे देशों के साथ व्यापार करने या स्वतंत्र प्रतिबंध नीतियां लागू करने में उसकी स्वायत्तता सीमित हो सकती है। समझौते के डिजिटल व्यापार और नियामक मानकों के विवरण से ऐसे समझौते हो सकते हैं जो आपसी लाभ के आश्वासनों के बावजूद अमेरिकी व्यवसायों के पक्ष में हों। इसके अलावा, रूस से भारत के ऊर्जा आयात का बड़ा पैमाना यह दर्शाता है कि किसी भी अचानक बदलाव से न केवल भारत के अपने आर्थिक विकास में बाधा आ सकती है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति तंग हो सकती है, जिससे कीमतें और महंगाई बढ़ सकती है। इसके लिए महंगी रिफाइनरी को फिर से कॉन्फ़िगर करने की भी आवश्यकता हो सकती है। अमेरिका ने संकेत दिया है कि वह भारत के रूसी तेल के आयात की निगरानी करेगा, जिससे नई दिल्ली की ऊर्जा खरीद रणनीतियों पर बाहरी जांच का एक और स्तर जुड़ जाएगा। यह स्थिति एक जटिल संतुलन का काम प्रस्तुत करती है, जहां भारत व्यापारिक लाभ उठाने के साथ-साथ अपनी ऊर्जा स्वतंत्रता की रक्षा करना चाहता है, एक ऐसी रणनीति जो भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर या जुड़ाव की शर्तें अप्रत्याशित रूप से प्रतिबंधात्मक साबित होने पर चुनौतियों का सामना कर सकती है।


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