मीरजापुर गोशाला में लापरवाही का आलम, मरणासन्न गायों की आंख नोचता कौआ।
राकेश मिश्रा, जागरण, मीरजापुर। गोशालाओं का निर्माण शासन की सर्वप्रमुख योजना में से एक थी, मंशा थी कि गोवंशों को आश्रय मिले। वह सड़क पर न भटके और न ही खेतों की फसल को नुकसान पहुंचाएं। बदले में गोवंश के लिए सरकारी खजाने का मुंह तक खोल दिया गया ताकि गोवंश का भरण पोषण हो सके और गायों को दवा चारा के साथ पोषक तत्व भी मिलें। प्रशासनिक अधिकारियों और पशु चिकित्सकों को जिम्मा मिला कि गोशालाओं में जाएं और जांच पड़ताल कर उनकी सेहत और स्वास्थ्य का ख्याल रखें। सारे प्रयासों के बाद होनी को मानो कुछ और ही मंजूर है।
सरकार के प्रयासों पर पलीता कुछ इस कदर लगा कि चारा के पोषण से प्रभारी मजबूत होते गए और गोवंश पोषण के अभाव में हड्डियों का ढांचा नजर आने लगे। वैसे तो पूर्वांचल की तमाम गोशालाओं में यह नजारा आम है। मगर नजीर के तौर पर ले लेते हैं मीरजापुर जिले में ड्रमंडगंज क्षेत्र के गलरा गो आश्रय स्थल का। जहां जागरण की टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद ही भीतर प्रवेश करने में सफलता पायी क्योंकि इस गौशाला की हालत बहुत बदतर है, लिहाजा भीतर की कारगुजारी सामने आने के भय से गायों की जगह बाहर से आने वालों पर निगरानी की जाती है।
सारे गोशाला कर्मी ग्राम प्रधान पति के कहने पर किसी को भी अंदर नहीं जाने देते हैं। खैर भीतर जाने में सफलता किसी तरह मिली तो भीतर के हालात चौंकाने वाले मिले। गायों की दुर्दशा देखकर रौंगटे खड़े हो गए। शनिवार की सुबह मरणासन्न अवस्था में पड़े दो गोवंश गोशाला में मौत से जूझ रहे थे। इस पर भी सबसे भारी नजारा दिखा जब आखिरी सांस ले रही गाय की आंख नोचता कौआ नजर आया,गाय के शरीर को जीते जी बेधता कौआ व्यवस्था और मंशा पर कालिख पोत रहा है।
गो आश्रय स्थल पर जिम्मेदारों की लापरवाही से दम तोड़ते गोवंशीय पशु की दुर्दशा देखकर आप भी मर्माहत हो सकते हैं या हालात पर आंसू बहा सकते हैं मगर जिम्मेदार जिनकी जेब सरकारी मदद से गर्म हो रही है उनकी तासीर जिम्मेदारी को लेकर इतनी ठंडी हो चुकी है कि गोवंशों की टूटती सांसों पर भी उनका जमीर मानों जागने से इन्कार कर रहा है।
कागा सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो मास... की वेदना यहां पर अवधारणा बनकर फलीभूत होती गोशाला में नजर आ रही है लेकिन गोवंश का बेधता शरीर जिम्मेदारों की आंखों से ओझल है। ओझल है प्रशासनिक मशीनरी भी जिनपर दौरा, निगरानी और कार्रवाई का दायित्व है। गोशाला में जख्मी, कुपोषित गायों की संंख्या अधिक है। साथ ही अधिकता है इस बात के संभावना की भी कि आगे गायों की और भी मौतें हों तो कोई अतिश्योक्ति नहीं। पशुपालन विभाग सिर्फ कागजों पर अपना कोरम पूरा कर रहा है। मगर, धरातल पर कौए आंख नोंच रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि गो आश्रय स्थल पर जिम्मेदारों की लापरवाही के कारण गोवंशीय पशु दम तोड़ रहे हैं। गौशाला में काम करने वाले कर्मी ग्राम प्रधान पति के निर्देश पर किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं देते। इससे भीतर की कारस्तानी और कारगुजारी सामने आती भी नहीं। लिहाजा गोशाला की वास्तविक स्थिति का पता लगाना मुश्किल हो गया है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारियों की अनदेखी के कारण गोवंशों की यह दुर्दशा हो रही है।
गौशाला में गोवंशों की देखभाल के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी नहीं है, सरकार के पास बजट की कमी नहीं है। पशुओं को उचित भोजन और चिकित्सा सुविधा जो मिलनी चाहिए वह नहीं मिल रही है, जिससे उनकी स्थिति और भी बिगड़ रही है। ग्राम प्रधान पति की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि ग्राम प्रधान पति इस मामले में सक्रिय होते, तो शायद गोवंशों की यह दुर्दशा नहीं होती। इस मामले में प्रशासनिक पक्ष के लिए संपर्क नहीं हो सका था। |
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