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दान की मिसाल बने दरभंगा महाराज, दिल्ली का दरभंगा हाउस बना IB मुख्यालय, नरगौना पैलेस से मिथिला विश्वविद्यालय

LHC0088 2026-1-12 22:57:12 views 423
  

मधेश्वर परिसर में महारानी के अंतिम संस्कार में उनके पोते रत्नेश्वर सिंह से मिलते मंत्री दिलीप जयसवाल



मुकेश कुमार श्रीवास्तव, दरभंगा । दरभंगा महाराजाधिराज स्व. कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी कामसुंदरी देवी (93) के निधन से दरभंगा राज परिवार सहित भारत के इतिहास का एक युग समाप्त हो गया।

महारानी दरभंगा महाराज की तरह दानी थीं। उन्होंने जन कल्याण के लिए दिल्ली और दरभंगा का आवास तक दान कर दिया था। दिल्ली स्थित आवास दरभंगा हाउस में आइबी का मुख्यालय संचालित हो रहा है।

जबकि, दरभंगा स्थित आवास नरगौना पैलेस महल में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय संचालित है। इसमें कई विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक कार्यालय, स्नातकोत्तर विभाग सहित महाराजा कामेश्वर सिंह संग्रहालय है।

देश का पहला भूकंप रोधी यह महल लिफ्ट, एयर कंडीशनिंग सहित कई सुविधाओं से लैस था। वहीं, आजाद भारत में सबसे पुराने धर्म न्यासों में से एक महाराजा धार्मिक न्यास की एकल न्यासी के रूप में महाधिरानी कामसुंदरी थीं।

वह देश-विदेश के 108 मंदिरों समेत एक लाख एकड़ से अधिक की जमीन की संरक्षक थीं। मंदिरों के संचालन के लिए वे अंतिम समय तक लगी रहीं। राजपरिवार के सदस्य कुमुद सिंह का कहना है कि महाधिरानी कामसुंदरी भारत के राजशाही में आखिरी निशानी थीं।

संविधान सभा के 284 पुरुष सदस्यों में स्व. कामेश्वर सिंह भी शामिल थे। इस तरह वे इसमें शामिल पुरुषों की पत्नियों में एकमात्र अंतिम जीवित थीं। कुमुद सिंह के अनुसार ऐसे तो संविधान सभा में मूल रूप से 389 सदस्य थे, लेकिन देश के विभाजन के बाद, मुस्लिम लीग के सदस्य अलग हो गए।

ऐसे में 24 जनवरी 1950 को जिन 284 सदस्यों ने संविधान की अंतिम प्रति पर हस्ताक्षर किए, उनमें दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह भी थे। महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह (1907-1962) बिहार क्षेत्र से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में संविधान सभा के लिए चुने गए थे। वे 1947 से 1950 तक संविधान सभा के सदस्य रहे। उन्होंने भारतीय संविधान की मूल प्रति पर हस्ताक्षर करने के साथ \“दरभंगा\“ शहर का नाम भी लिखा था।
18 ड्योढ़ियों को दी गई महारानी के निधन की सूचना

दरभंगा राज की सभी 18 ड्योढ़ियों को महारानी के निधन की सूचना दी गई, ताकि अंतिम संस्कार में परिवार के सभी सदस्य शामिल हो सकें। हालांकि, समय अभाव के कारण सभी ड्योढ़ियों से सदस्य नहीं पहुंच पाए।

बताया जाता है कि छोटे पौत्र राजकुमार कपिलेश्वर सिंह के नहीं आने से महारानी के मायके के लोग अंतिम निर्णय लेने के अधिक परेशान बने हुए थे। इस कारण कल्याणी निवासी में पूरे दिन आपाधापी की स्थिति बनी रही।
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