लालो: कृष्णा सदा सहायते रिव्यू
एकता गुप्ता, नई दिल्ली। अजय देवगन की फिल्म शैतान तो आपको याद ही होगी, इसे दर्शकों ने खूब प्यार दिया और साथ ही इस फिल्म से गुजराती सिनेमा की खूबियां भी बाहर आईं। क्योंकि शैतान, एक गुजराती फिल्म वश का ही हिंदी वर्जन थी। वहीं अब एक और गुजराती फिल्म है जिसने ना सिर्फ दर्शकों का दिल जीता बल्कि यह 100 करोड़ कमाने वाली पहली गुजराती फिल्म भी बनी।
क्या है फिल्म की कहानी?
लालो कृष्ण सदा सहायते एक रिक्शा ड्राइवर लालो की कहानी है जो अपने माता पिता के खिलाफ जाकर अपनी गर्लफ्रेंड तुलसी से शादी करता है और फिर दोनों के घरवाले उनसे मुंह मोड़ लेते हैं क्योंकि दोनों ने उनके खिलाफ जाकर एक-दूसरे से शादी की। कुछ वक्त बाद उनकी एक बेटी हो जाती है जिसका नाम है-खुशी। लालो (करण जोशी) और तुलसी (रीवा रछ) अपनी छोटी सी दुनिया में खुश होते हैं। कहानी में मोड़ तब आता है जब उनकी बेटी खुशी का एक्सीडेंट हो जाता है और लालो को किसी से 5 लाख उधार लेने पड़ते हैं। इसके बाद वह बुरी संगत में पड़ जाता है और उसे शराब की लत लग जाती है।
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शराब की लत और गलत संगत की बेतुकी राय के चलते वह घर में आए दिन कलेश करने लगता है और अपनी बीवी पर हाथ उठाने की कोशिश तक करता है। एक दिन बहुत ज्यादा लड़ाई करने के बाद कर्ज के तले दबा लालो एक फार्महाउस में चोरी करने के इरादे से घुस जाता है जहां उसे नोटों से भरा एक सूटकेस मिलता है। जैसे वह दरवाजा खोलकर सूटकेस के साथ भागने की कोशिक करता है, दरवाजे से जोर का करंट लगता है और वह नीचे गिर जाता है। वह दरवाजा नहीं खोल पाता और कई दिनों तक उस घर में फंसा रहता है-भूखा-प्यासा। दूसरी तरफ उसकी पत्नी और बेटी बहुत परेशान रहती हैं।
एक दिन अचानक उसे वो इंसान आकर मिलता है जिसे उसने कभी अपने रिक्शे में जूनागढ़ घुमाया था। यह इंसान ही भगवान श्रीकृष्ण के रूप में आता है जिनका किरदार श्रुहद गोस्वामी ने निभाया है। वह लालो को उस बंद घर में सही मार्गदर्शन दिखाने की कोशिश करते हैं । तो क्या लालो उस मार्गदर्शन से लालच को छोड़कर सही रास्ते पर आ पाता है या फिर वह वहीं फंसा रह जाता है यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।
लालो-कृष्णा सदा सहायते रिव्यू
लालो-कृष्णा सदा सहायते की कहानी अंकित सखिया ने लिखी है और डायरेक्टर भी इन्हीं ने किया। आस्था, कर्म, मेहनत को दिखाने वाली इस कहानी का सबसे मजबूत पक्ष कलाकारों की नेचुरल एक्टिंग है। जिसमें करन जोशी, रीवा रच और श्रुहद गोस्वमी ने बेहतरीन काम किया है।
कोई लाग लपेट वाली कहानी दिखाने के बजाय एक सादी घरेलू कहानी के माध्यम से इंसान के ज्यादा सफल होने, पैसे कमाने, महान बनने से पहले इंसान बनने का महत्व बहुत ही आसानी से समझाया गया है। लालो का पैसों से भरे सूटकेस का लालच तब छूटता है जब उसे कई दिनों तक खाना ना मिलने अपने परिवार से दूर रहने का दुख उसे समझ आता है, वो परिवार जो इन पैसों से ज्यादा कीमती है। दूसरी ओर लालो के दूर होने के बाद उसका परिवार एकजुट होकर उसे ढूंढने की कोशिश करता है।
कहानी के बीच में कई सोशल मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है। जो पत्नी अब तक पैसों के लिए पति पर निर्भर रहती थी-नौकरी करने लगती है। एक पति जो अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए पत्नी पर हाथ उठाने के तक पहुंच गया था उसे उसकी अहमियत समझ आती है। सबसे गंभीर बात चाहे आप ऑटो रिक्शा चलाने वाले ही क्यों ना हो लेकिन अगर आपके पास आपकी फैमिली, रहने को छत और खाना, जीवन में शांति हो तो आप दुनिया के सबसे अमीर आदमी हो।
कलाकारों की एक्टिंग के साथ इसकी कहानी भी दमदार है, सिनेमैटोग्राफी कहानी के हिसाब से ठीक बैठती है और बांसुरी का म्यूजिक फिल्म के अर्थ को और भी प्रभावशाली बना देता है। इस फिल्म का एक मूल अर्थ है कि- इंसान को कुछ और बनने से पहले एक अच्छा इंसान बनना चाहिए।
क्या है कोई कमी?
हिंदी वर्जन में कई डायलॉग कमजोर लगते हैं, देखा जाए तो कोई खास लाइनें या डायलॉग याद नहीं रहते हैं। जो याद रहते हैं वे कई बार पहले ही सुने होते हैं। कृष्ण का अर्जुन को ज्ञान देना, कर्म कर फल की चिंता मत कर ये कई फिल्मों में दोहराया जा चुका है। इसीलिए डायलॉग में नएपन की कमी खलती है। बैकग्राउंड म्यूजिक और अच्छा हो सकता था वहीं कहानी को और अच्छे तरीके से भुना जा सकता था।
क्यों देखें?
अगर आप आस्था में विश्वास रखते हैं कुछ डिवोशनल देखना चाहते हैं तो यह फिल्म आपके लिए है जो आपके विश्वास को और बढ़ाने का काम करेगी।
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