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अजेय विश्वास का जयघोष

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सोमनाथ मंदरि।  



भारत ने एक लंबा कालखंड ऐसे शासकों के अधीन बिताया, जिन्होंने लूट के नाम पर धार्मिक विध्वंस किए, फिर भी भारतीय संस्कृति जीवित रही। सोमनाथ मंदिर इसी अजेय विश्वास का सबसे बड़ा प्रतीक है।

एक हजार साल पहले भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान मिटाने के लिए किए गए कुप्रयासों के विरुद्ध भारतीयता के पुनर्जागरण की अटूट शक्ति और जीवंतता पर प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी का विश्लेषण...

विश्व की समस्त सभ्यताओं के अविनाशी प्रतीक एवं विश्वास होते हैं। मानव इतिहास में जब सभ्यता के यह आधार विलुप्त होते हैं, तो उक्त सभ्यता का अंत सुनिश्चित हो जाता है। इतिहास की दृष्टि से भारत एक मात्र ऐसा राष्ट्र है, जिसके विषय में यह कहना किंचित अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यहां लगभग हजार वर्षों तक ऐसे राजनैतिक एवं सांस्कृतिक आक्रमणों के दंश को झेला गया, जिसके उदाहरण कंपन पैदा करते हैं।

कल्पना कीजिए कि किसी भौगोलिक क्षेत्र के लंबे कालखंड में राष्ट्र का प्रतिनिधित्व एक ऐसा राज्य कर रहा था, जिसको किसी भी रूप से राष्ट्र के प्रतिनिधि की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। इस महादंश को झेलते हुए भी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति जीवंत रही, यह निश्चित ही वैश्विक इतिहास की अद्भुत घटना है। एक हजार वर्षों के विध्वंस के साक्ष्य गवाह हैं कि आक्रमणकारी का लक्ष्य मात्र आर्थिक नहीं अपितु सांस्कृतिक जड़ों को समाप्त करना होता है। सोमनाथ इसका सजीव उदाहरण है।
पुनरुद्धार का संकल्प

13 नवंबर, 1947 को समुद्र का जल हाथ में लेकर जब सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार की शपथ ली, तो वे उस सभ्यता एवं विश्वास को भारतीयता के जागरण के रूप में देख रहे थे, जिसे बर्बर आक्रमणकारियों ने समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोडी थी। परंतु सोमनाथ, विश्वास की धारा में भारतीयों के मानस पटल पर जागृत थे। के. एम. मुंशी के अनुसार प्रभास पाटन, जिसे देवपाटन भी कहते है, जहां सोमनाथ मंदिर स्थित है, वह प्राच्य ग्रंथों के अनुसार सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ है।
भ्रामक दावों से भरा इतिहास

12 ज्योर्तिलिंगों में प्रथम सोमनाथ महादेव के प्रमुख तीर्थ स्थल पर विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी द्वारा जनवरी, 1026 में पहला बर्बर विखंडन किया गया, जो भारतीय जनमानस के इस विश्वास के प्रतीक पर आक्रमण था। इसकी रक्षा करते हुए 50 हजार से अधिक सनातनियों ने प्राणों की आहुति दी। इस भीषण कांड को कुछ प्रगतिवादी कहे जाने वाले इतिहासकारों ने मात्र एक लूट की संज्ञा दी। वे आश्चर्यजनक रूप से इस तथ्य को दबा गए कि गजनवी ने स्वयं को मूर्ति भंजक स्थापित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

एक तथाकथित प्रगतिवादी इतिहासकार द्वारा तो महमूद के सोमनाथ पर आक्रमण को यहां तक वैधता दी गई कि उसने सोमनाथ पर आक्रमण इस प्रयोजन से किया था क्योंकि वहां ‘मन्नत की मूर्ति’ रखी हुई है। उसका इरादा सोमनाथ की मूर्तियों को तोड़ने का कतई नहीं था। प्रश्न उठता है कि गजनवी ने मथुरा का विध्वंस क्यों किया? वहां किसकी मूर्ति होने की शंका थी? पद्मनाभ द्वारा रचित ‘कान्हड़दे प्रबंध’ इस प्रकार के अनेक विखंडनों की चर्चा करता है।
फिर से टूटा बर्बरता का पहाड़

गजनवी ने सोमनाथ पर बर्बरता की, किंतु सनातनियों ने इसे पुनः खड़ा कर दिया। आस्था एवं विश्वास की धरोहर पर दूसरा बर्बर आक्रमण सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी द्वारा किया गया। पुनः शिवलिंग एवं मंदिर परिसर को खंडित करते हुए आस्था पर गहरी चोट की गई। यह और भी गंभीर था, क्योंकि खिलजी और उसके वंशज गजनवी की तरह भारत से वापस नहीं गए। बाद में वर्ष 1701 में औरंगजेब ने गुजरात के प्रमुख अपने पुत्र मोहम्मद मुअज्जम को आदेश दिया कि सोमनाथ को ऐसे ध्वस्त कर दिया जाए कि वह कभी भी पुनरुद्धार के लायक ना रहे। यह फरमान क्यों दिया गया? समझने की आवश्यकता है।

1706 में सोमनाथ मंदिर ने पुनः तीसरा दंश झेला। यह और खतरनाक था क्योंकि इसे तोड़ यहां एक मस्जिद का निर्माण कर दिया। इन सबके बावजूद विश्वास, आस्था एवं सभ्यता के इस ठोस प्रतीक को जीवंत रखने का क्रम समाप्त नहीं हुआ। देवी अहिल्याबाई द्वारा पुनर्निर्माण नए रूप में कराया गया। परंतु अभी भी इतिहास को बहुत कुछ देखना था। जूनागढ़ का नवाब भारत की स्वाधीनता से पूर्व पाकिस्तान में विलय चाहता था। इस रियासत में सोमनाथ, गिरनार पर्वत, जूनागढ़ के पास संत नरसिंह की जन्मस्थली थी। जूनागढ़ कैसे बचा, किसने बचाया, इतिहास में यह दास्तान सरदार वल्लभ भाई पटेल के शौर्य और दृढ़ता के रूप में है।

स्वतंत्रता पश्चात कैलास महामेरु प्रसाद की स्थापत्य कला से सोमनाथ मंदिर को अपने विशाल रूप में प्रकट होने के लिए राजनीतिक-सांस्कृतिक गलियारों की अड़चनों से गुजरना पड़ा, यह सार्वजनिक है। विध्वंस के एक हजार वर्ष पश्चात आज सोमनाथ मंदिर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का एक अविनाशी स्तंभ है, यह सर्वमान्य है। सोमनाथ यह सिद्ध करता है कि भारत आध्यात्मिक तो है, परंतु विध्वंस की स्मृतियों को भी उसका जन मानस नष्ट नहीं होने देता। सोमनाथ भारत के लिए केवल विजय का नहीं, बल्कि आत्मसंतुलन और विवेक का भी प्रतीक है।
मंदिर पुनर्निर्माण को स्वीकृति

तत्कालीन केंद्रीय लोक निर्माण मंत्री एन.वी. गाडगिल ने लिखा था: ‘एक नवंबर, 1947 को सरदार पटेल और मैं सोमनाथ मंदिर गए। वहां मैंने इसके पुनर्निर्माण के बारे में सोचा और सरदार पटेल से इसका जिक्र किया, उन्होंने तुरंत इसकी स्वीकृति दे दी। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर खड़े होकर मैंने घोषणा की कि भारत सरकार ने मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्णय लिया है। एक घंटे बाद वल्लभ भाई पटेल ने देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा निर्मित मंदिर के मंडप में इसी तरह की घोषणा की। जो बात सबसे महत्वपूर्ण थी, वह यह कि यहीं से संयुक्त सौराष्ट्र राज्य के विचार का भी जन्म हुआ। नवानगर के जामसाहब दिग्विजय सिंह ने सरदार पटेल के साथ बातचीत की और दो महीने के भीतर 342 छोटी-बड़ी रियासतों के विलय के साथ सौराष्ट्र राज्य का गठन हो गया।

काठियावाड़ में हमें सोमपुरा समुदाय के ऐसे शिल्पकार मिले, जो पत्थरों पर प्राचीन काल की तरह ही समृद्ध प्रतिमाओं और सजावट को उकेरने में सक्षम थे। हमने उनकी सहायता से मंदिर को पुनर्स्थापित करने का निर्णय लिया। वल्लभभाई पटेल और मैंने इस उद्देश्य के लिए 50 लाख रुपये एकत्र कर लिए। पहले यह कार्य केंद्र सरकार के माध्यम से करने का निर्णय लिया गया था, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने इसे स्वीकृति नहीं दी। गांधी जी की सलाह पर, यह कार्य एक ट्रस्ट को सौंपने का निर्णय लिया गया, जिसमें केंद्र सरकार का केवल एक प्रतिनिधि रखने की बात तय हुई।

1951 तक, मंदिर का पूरा आधार और गर्भगृह तैयार हो गया था और हमने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से लिंग-प्रतिष्ठा के मुख्य अतिथि बनने का अनुरोध किया। जवाहर लाल नेहरू ने इस पर राय व्यक्त की कि देश के राष्ट्रपति को इस समारोह में शामिल नहीं होना चाहिए। मगर राष्ट्रपति अपने निर्णय पर अडिग थे और उन्होंने नेहरू को अपने फैसले के बारे में बता दिया साथ ही यह भी कह दिया कि आवश्यकता पड़ने पर वह इस सम्मानित पद से त्यागपत्र देने के लिए भी तैयार हैं।’
सरदार का संकल्प

‘इस मंदिर के प्रति हिंदुओं की भावनाएं अत्यंत प्रबल और व्यापक हैं। आज इसकी संभावना कम है कि उस भावना को केवल मंदिर की छोटी-मोटी मरम्मत करने मात्र से संतुष्ट किया जा सके। मूर्ति की पुनर्स्थापना हिंदू जनता के लिए सम्मान और भावना की बात है।’

(सोमनाथ पुनर्निर्माण परियोजना के मुख्य निष्पादकों में से एक, के.एम. मुंशी को लिखा गया पत्र)
आंखों में आए आंसू

‘सरदार पटेल जूनागढ़ से सोमनाथ मंदिर गए। मंदिर की अत्यंत जर्जर स्थिति देखकर सरदार पटेल का हृदय द्रवित हो उठा और उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने अपने हाथ में समुद्र का जल लेकर संकल्प लिया और इसे धरती पर अर्पित करते हुए धीमी लेकिन दृढ़ आवाज में कहा कि इस मंदिर का गौरव पुनः स्थापित होगा।’

(जेठालाल जोशी, ‘दिस वाज सरदार’से)
नेहरू की नापसंदगी

‘यह हैरतअंगेज है कि हमारे दूतावासों को विदेश में नदियों का जल और विभिन्न पर्वतों की वनस्पतियां एकत्र करने के लिए कहा गया है। मैंने कुछ समय पहले राष्ट्रपति से उल्लेख किया था कि मुझे इस अवसर पर उनका सोमनाथ मंदिर जाना पसंद नहीं है। मगर उन्होंने कहा कि वे वहां जाने के लिए वचन दे चुके हैं और उनके लिए अपने वादे से पीछे हटना कठिन है, लेकिन मैंने राष्ट्रपति और श्री मुंशी, दोनों को स्पष्ट कर दिया है कि मुझे ये गतिविधियां बिल्कुल पसंद नहीं आ रही हैं। क्या विदेश मंत्रालय को विदेश में हमारे दूतावासों को विभिन्न नदियों का जल मंगाने के लिए लिखे गए इन पत्रों के बारे में कुछ जानकारी है? मेरा विचार है कि आप हमारे दूतावासों को लिख सकते हैं कि वे इन अपीलों पर जरा भी ध्यान न दें!’

(महासचिव और विदेश सचिव, विदेश मंत्रालय को नोट, 17 अप्रैल 1951)
के.एम. मुंशी के नाम पत्र

नई दिल्ली, 22 अप्रैल, 1951

प्रिय मुंशी,

मुझे विदेश में बन रही इस धारणा से दुख हो रहा है कि सोमनाथ प्रतिष्ठा समारोह कमोबेश एक सरकारी मामला है। संसद में सवाल पूछे जाने वाले हैं और मैं यह स्पष्ट कर दूंगा कि भारत सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है।
आपका शुभचिंतक,
जवाहरलाल नेहरू
सोमनाथ मंदिर समारोह पर टिप्पणी

‘सोमनाथ में हो रहे समारोह के साथ भारत सरकार के जुड़ाव से मुझे बहुत दुख हुआ है। मैंने इस बारे में जाम साहब और सौराष्ट्र सरकार को लिखा था। मुझे अब पता चला है कि वास्तव में भारत सरकार के कई मंत्रालय, जिसमें हमारा मंत्रालय भी शामिल है, से परामर्श किया गया था और वास्तव में उन्होंने उठाए गए विभिन्न कदमों को प्रोत्साहित किया था। मुझे डर है कि अब हम इस मामले में आगे कुछ नहीं कर सकते, लेकिन मुझे लगता है कि यह पूरी प्रक्रिया अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।’

(एस. दत्त, सचिव, विदेश मंत्रालय को नोट, 9 मई 1951)
दिग्विजय सिंह जी (जाम साहब) के नाम पत्र

नई दिल्ली, 24 अप्रैल, 1951

प्रिय जाम साहब,

मैं इस तथ्य और पुनरुत्थानवाद से परेशान हूं कि हमारे राष्ट्रपति, कुछ मंत्री और सौराष्ट्र राजप्रमुख के रूप में स्वयं आप इस सबसे जुड़े हैं। मेरा मानना है कि यह हमारे राज्य के स्वरूप के अनुरूप नहीं है और मैं आपको बता रहा हूं कि इसके राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुरे परिणाम होंगे।

जवाहरलाल नेहरू

यह भी पढ़ें: 6 टन सोना और हवा में लटकता शिवलिंग! क्या था सोमनाथ का वो रहस्य, जिसे देख गजनवी भी रह गया था दंग?
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