हरियाणा के कैबिनेट मंत्री विपुल गोयल का फाइल फोटो।
अनुराग अग्रवाल, चंडीगढ़। हरियाणा और दिल्ली समेत समूचा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) जब वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है, ऐसे में मिनी फारेस्ट की परिकल्पना ने ऐसा साकार रूप लिया, जो भविष्य की प्रदूषण की चुनौतियों से निपटने में कारगर साबित हो सकती है।
इको-वन नाम से ऐसी परियोजना की शुरुआत की जा चुकी है, जहां हरियाली है...फूल-पौधों पर मंडराती रंग-बिरंगी तितलियां हैं...नगर वन हैं..ऑक्सीवन और हर्बल पार्क है। इको वन केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि शासन की वह सोच है, जो कचरे से हरियाली की दिशा में काम करती है, जहां सजावट नहीं बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करना प्राथमिकता बन चुकी है।
हरियाणा सरकार की इस महत्वपूर्ण परियोजना की शुरुआत शहरी निकाय, नागरिक उड्डयन और राजस्व एवं आपदा प्रबंधन मंत्री विपुल गोयल ने फरीदाबाद जिले से की है। फिलहाल यहां 12 इको-वन तैयार किए गए हैं। परियोजना पूरी तरह से जन सहभागिता पर आधारित है, जो लोगों को जीने का नया अंदाज प्रदान करेगी, बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को सीधे प्रकृति से जोड़ेगी।
अकेले फरीदाबाद में करीब 500 इको-वन (मिनी फारेस्ट) विकसित किए जाएंगे। खास बात यह है कि ये मिनी फारेस्ट ऐसे स्थानों पर विकसित हो रहे हैं, जहां कभी कूड़ा-गंदगी और अनुपयोगी स्थान रहा है। फरीदाबाद के बाद धीरे-धीरे पूरे राज्य में इको-वन परियोजनाओं का दायरा बढ़ाया जाएगा।
हमारी परंपरा में धरती माता है, पेड़-पौधे जीवन के प्रतीक हैं और जल भविष्य का आधार। आज जब शहरीकरण एक आवश्यकता है, सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि विकास प्रकृति को आहत न करे, बल्कि उसे उन्नत बनाए। इसी सोच से इको-वन (मिनी फारेस्ट) की पहल ने आकार लिया है।
यह एक ऐसी कोशिश है, जिसमें शहर के भीतर ही जीवन को लौटाया गया है। इको-वन और मिनी फारेस्ट की यह परिकल्पना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोच की देन है। कुछ समय पहले तक जो कोने बेहतरी कती राह देख रहे थे, आज उन्हीं जगहों पर हरियाली है, पक्षियों की मधुर ध्वनि है। यह बदलाव संयोग नहीं, संकल्प का परिणाम है।
हरियाणा के शहरी निकाय मंत्री विपुल गोयल के अनुसार फरीदाबाद में अब तक जो 12 से अधिक मिनी फारेस्ट तैयार हो चुके हैं, वह आवासीय सेक्टरों, ट्रैफिक आइलैंडस और पुराने लैंडफिल के किनारों पर विकसित किए गए हैं। ये छोटे जंगल किसी एक तरह की हरियाली तक सीमित नहीं हैं।
हमने चुनकर ऐसे स्थल विकसित किए, जहां घने वुडलैंड्स, खुले घास के मैदान और छोटे जल-क्षेत्र एक साथ मौजूद हैं। इसका उद्देश्य केवल पेड़ लगाना नहीं था, बल्कि एक ऐसा ढांचा बनाना है जो वास्तविक इको सिस्टम की तरह काम करे।
ऐसे स्थल जहां पक्षियों को बसेरा मिले, कलियों को खिलाने वाले भ्रमर यानि परागण करने वाले कीट लौटें, उभयचर और छोटे जीव फिर दिखाई दें और भूजल पुनर्भरण भी हो सके। जब अलग-अलग माइक्रो-हैबिटैट साथ आते हैं, तभी प्रकृति टिकाऊ रूप में वापस आती है।
शहरों के भीतर भी लौट सकेगी जैव-विविधता
निकाय मंत्री विपुल गोयल का कहना है कि शहरों के भीतर भी जैव-विविधता लौट सकती है। यह केवल पर्यावरण की जीत नहीं है, बल्कि शहरी जीवन की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार है। इस पहल की असली ताकत सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि नागरिकों की भागीदारी में है।
जहां पहले खुले डंप को लेकर उदासीनता थी, वहां अब संरक्षण की भावना है। बच्चों के लिए ये स्थल प्रकृति की कक्षा बन गए हैं, बुजुर्गों के लिए शांति का कोना और परिवारों के लिए साझा गर्व का कारण। जब समुदाय किसी हरित स्थल को अपना मान लेता है, तभी वह स्थायी बनता है।
यही जनभागीदारी हमारे हर प्रयास की आत्मा है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास हर जिले में शुरू किए जा सकते हैं, जो धीरे-धीरे बड़ा जन आंदोलन बन जाएंगे। शासन दिशा दे सकता है, पर यात्रा समाज को ही पूरी करनी होती है। |