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गरीबी का मारा RIMS बेचारा! 10 रुपये का सिरिंज, 30 रुपये के हार्ट की दवा तक नहीं, झारखंड के सबसे बड़े अस्पताल में मरीजों की बेबसी

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रिम्स में सर्जिकल आइटमों का गंभीर संकट, मरीजों पर बढ़ा आर्थिक बोझ।



जागरण संवाददाता, रांची। राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) में सर्जिकल आइटमों की भारी कमी सामने आई है। हालात ऐसे हैं कि 10 रुपये का सिरिंज तक अस्पताल में उपलब्ध नहीं है। सिरिंज, आइवी सेट, नेबुलाइजर मास्क जैसी बुनियादी सामग्री के अभाव में मरीजों और उनके परिजनों को इलाज के दौरान लगातार बाहर से खरीदारी करनी पड़ रही है।

इससे न सिर्फ इलाज में देरी हो रही है, बल्कि पहले से आर्थिक संकट झेल रहे मरीजों पर अतिरिक्त बोझ भी बढ़ गया है। सबसे खराब स्थिति आइसीयू और ट्रामा सेंटर की है, जहां गंभीर मरीजों के लिए जरूरी नेबुलाइजर मास्क तक उपलब्ध नहीं है।

यह वही रिम्स है, जहां हर साल दवाओं की खरीद पर 10 से 12 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। इसके बावजूद हकीकत यह है कि यहां भर्ती मरीजों को यहीं के डाक्टरों द्वारा लिखी गई अधिकतर दवाएं और अब सर्जिकल आइटम तक नहीं मिल पा रहे हैं।
दवाएं भी बाहर से, अब सर्जिकल सामान की बारी

रिम्स में पहले से ही दवाओं की भारी किल्लत है। कार्डियोलाजी और न्यूरोलाजी विभाग में भर्ती मरीजों को नियमित रूप से महंगी दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। क्रिटिकल केयर यूनिट में तो स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां जीवनरक्षक दवाएं मरीजों को अपने खर्च पर लानी पड़ रही हैं।

अब जब बुनियादी सर्जिकल सामग्री भी खत्म हो गई है, तो मरीजों की परेशानी कई गुना बढ़ गई है। मरीजों का कहना है कि जान बचाने के लिए जो भी दवाएं या सर्जिकल आइटम डाक्टर लिखते हैं, उन्हें बिना सवाल किए खरीदना पड़ता है।

उन्हें डर रहता है कि कहीं उनकी वजह से इलाज में देरी न हो जाए और मरीज की जान खतरे में न पड़ जाए। इस बेबसी में अधिकांश मरीज और स्वजन चुपचाप खरीदारी कर रहे हैं, लेकिन सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज और सुविधाओं के दावों पर अब सवाल उठने लगे हैं।

आइसीयू में कई दिनों से नेबुलाइजर मास्क उपलब्ध नहीं है, जबकि गंभीर मरीजों के इलाज में इसकी नियमित जरूरत पड़ती है। यह पहली बार है जब रिम्स में इस तरह की बुनियादी सामग्री की कमी सामने आई है। डाक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को भी मरीजों के स्वजनों से बाहर से सामान लाने को कहना पड़ रहा है, जिससे दोनों पक्षों के बीच असहज स्थिति बन रही है।
प्रबंधन की तैयारी, लेकिन मरीजों को राहत नहीं

एक ओर जहां मरीज सर्जिकल आइटम और दवाओं के लिए परेशान हैं, वहीं दूसरी ओर रिम्स प्रबंधन अपनी फार्मेसी खोलने की तैयारी में जुटा है। बताया जा रहा है कि इस सस्ती दवा दुकान में दवाओं के साथ-साथ अन्य जरूरी मेडिकल सामान भी उचित दाम पर उपलब्ध कराया जाएगा।

लेकिन सवाल यह है कि जब तक यह व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक भर्ती मरीजों को जो सुविधाएं मिलनी चाहिए, उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा।

सरकारी अस्पताल होने के नाते रिम्स से यह अपेक्षा की जाती है कि यहां मरीजों को बुनियादी इलाज और आवश्यक सामग्री मुफ्त मिले। लेकिन वर्तमान हालात ने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है।

मरीजों का कहना है कि अगर सिरिंज, आइवी सेट और नेबुलाइजर मास्क जैसी चीजें भी बाहर से लानी पड़ें, तो सरकारी अस्पताल और निजी अस्पताल में फर्क ही क्या रह जाता है।

डाक्टरों का मानना है कि यह संकट केवल आपूर्ति की कमी का नहीं, बल्कि लचर प्रबंधन और खरीद प्रक्रिया की देरी का परिणाम है। यदि समय रहते व्यवस्था दुरुस्त नहीं की गई, तो इसका सीधा असर मरीजों की जान पर पड़ सकता है। केस स्टडी से समझिए मरीजों की बेबसी-
केस 1 : 10 रुपये के सिरिंज के लिए दौड़ते रहे परिजन

ट्रामा सेंटर में गंभीर हालत में भर्ती 42 वर्षीय सोबित शेख को ट्राली पर रखकर इलाज चल रहा था। लेकिन इलाज के दौरान परिजनों को दवाओं की सूची के साथ 50 एमएल सिरिंज लाने को कहा गया।

महज 8 से 10 रुपये कीमत वाले इस सिरिंज के लिए स्वजन मरीज को ट्राली पर छोड़कर अस्पताल के बाहर दुकानों के चक्कर लगाते रहे। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, बल्कि नर्सों की ओर से बारी-बारी से नई पर्चियां दी जाती रहीं।
केस 2 : बेड मिला, पर दवा और सिरिंज खुद खरीदनी पड़ी

धुर्वा निवासी 55 वर्षीय अशोक मजूमदार को छाती दर्द की शिकायत पर ट्रामा सेंटर में भर्ती किया गया। उन्हें बेड तो मिल गया, लेकिन सिरिंज और दवाएं खुद बाहर से खरीदनी पड़ीं।

उन्होंने बताया कि उन्हें यह भी नहीं पता था कि अस्पताल में क्या-क्या मिलना चाहिए। आसपास के मरीजों को देखकर यही लगा कि यहां कुछ भी उपलब्ध नहीं है, इसलिए बिना सवाल किए उन्होंने बाहर से सब कुछ खरीदा।
केस 3 : रोज 600 से 1000 रुपये की दवाएं

हजारीबाग से इलाज कराने आए टेकनारायण मेहता कार्डियोलॉजी विभाग में भर्ती हैं। उन्हें हर दिन 600 से 1000 रुपये तक की दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। गैस की दवा से लेकर खून पतला करने वाली दवा तक सब कुछ निजी मेडिकल स्टोर से लेना पड़ रहा है।

यहां तक कि मेटोडेक्स एक्सएल जिसकी कीमत मात्र 30 रुपये है वह भी अस्पताल में उपलब्ध नहीं है। स्वजनों का कहना है कि डाक्टर की फीस तो नहीं लग रही, लेकिन दवाओं पर खर्च करते-करते वे आर्थिक रूप से टूट चुके हैं।
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