दिल्ली स्पेशल प्रोविजंस एक्ट राजधानी में अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई में बाधा बन रहा है। सांकेतिक तस्वीर
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली स्पेशल प्रोविजंस एक्ट राजधानी दिल्ली में अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई करने में बाधा बन रहा है। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मॉनिटरिंग कमेटी के निर्देशों पर 2006-07 में अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई के बाद यह एक्ट संसद में पेश किया था। इस एक्ट के अनुसार, एक तय समय सीमा के भीतर अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती।
इसे इस एक्ट के तहत सुरक्षा मिली हुई है। इससे एजेंसियां इस एक्ट का हवाला देकर कार्रवाई न करने का बहाना बनाती हैं। हालांकि, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर अलग-अलग समय पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की गई है, लेकिन MCD खुद से कार्रवाई नहीं करती है।
2007 में पेश किया गया था एक्ट
यह एक्ट शुरू में 2007 में पेश किया गया था। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वह दिल्ली में अवैध निर्माण और अतिक्रमण की समस्या पर काम करेगी, और इसलिए, इस एक्ट के तहत नियमों का दुरुपयोग करके बनाई गई संपत्तियों की सुरक्षा के लिए यह एक्ट लाया गया था। इसने 8 फरवरी, 2007 तक अवैध रूप से बनी इमारतों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।
इसके लागू होने के बाद पहले तीन सालों तक, एक्ट को एक-एक साल के लिए बढ़ाया गया। 2011 में, इसे तीन साल के लिए बढ़ाया गया। उसके बाद, इसे 2014, 2017, 2020 और 2023 में तीन-तीन साल के लिए बढ़ाया गया। एक्ट का मौजूदा विस्तार दिसंबर 2026 तक है। 2014 में, अवैध निर्माणों की सुरक्षा की समय सीमा भी बदल दी गई थी। इसे 8 फरवरी, 2007 से बढ़ाकर 30 जून, 2014 कर दिया गया था।
दिल्ली में 2000 से ज्यादा अनाधिकृत कॉलोनियों में लगभग 50 लाख अवैध निर्माण हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यही स्थिति है। इसके अलावा, नियोजित और अनियोजित दोनों क्षेत्रों में हर साल अवैध निर्माण और अतिक्रमण की समस्या बढ़ रही है, लेकिन MCD अधिकारी इस एक्ट का हवाला देकर पुरानी संपत्तियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते हैं।
यह एक्ट अस्थायी रूप से पेश किया गया था, लेकिन इसे बार-बार बढ़ाया जा रहा है। अवैध निर्माण के संबंध में एक सीमा तय करने की जरूरत है ताकि भविष्य में ऐसा न हो। हालांकि, एक्ट को बार-बार बढ़ाया जा रहा है, लेकिन समस्या को हल करने के लिए कोई काम नहीं किया जा रहा है। इसी एक्ट की वजह से अधिकारी अवैध निर्माण और अतिक्रमण हटाने में बहाने बना रहे हैं। - जगदीश ममगैन, पूर्व चेयरमैन, कंस्ट्रक्शन कमेटी, MCD
दिल्ली स्पेशल प्रोविजंस एक्ट क्या है?
- पूरा नाम: National Capital Territory of Delhi Laws (Special Provisions) Second Act, 2011 (मूल रूप से 2006 से शुरू, 2011 में व्यापक रूप दिया गया)।
- यह एक अस्थायी कानून है जो दिल्ली में अवैध निर्माणों, अनधिकृत कॉलोनियों, झुग्गी-झोपड़ी क्लस्टर, अतिक्रमण आदि को एक निश्चित समय तक सीलिंग, डेमोलिशन या पनिशमेंट से सुरक्षा प्रदान करता है।
कब और क्यों लागू हुआ?
- शुरूआत: 2006 में Delhi Laws (Special Provisions) Act, 2006 के रूप में (1 साल के लिए)।
- कारण: सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी के निर्देश पर 2006-07 में अवैध निर्माणों पर बड़ी कार्रवाई हुई →
- राजनीतिक और सामाजिक दबाव, कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया कि समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाएगा। इसलिए अस्थायी सुरक्षा के लिए एक्ट लाया गया।
- 2011 में: National Capital Territory of Delhi Laws (Special Provisions) Second Act के रूप में व्यापक रूप दिया गया।
- बार-बार विस्तार: अस्थायी था, लेकिन नीतियां और मास्टर प्लान तैयार करने में समय लगने के बहाने बढ़ाया जाता रहा।
- वर्तमान स्थिति (2026 तक): दिसंबर 2023 में संशोधन कर 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ाया गया।
मुख्य प्रावधान
- निर्धारित कट-ऑफ डेट तक के अवैध निर्माणों पर पनिशमेंट (सीलिंग/डेमोलिशन) पर रोक (वर्तमान में 1 जून 2014 तक के निर्माण सुरक्षित)।
- केंद्र सरकार को निर्देश: झुग्गी वासियों का पुनर्वास, अनधिकृत कॉलोनियों का रेगुलराइजेशन, स्ट्रीट वेंडर्स की नीति, फार्म हाउस आदि के लिए नियम बनाना।
- सुरक्षा श्रेणियां: अनधिकृत कॉलोनियां, गांव अबादी क्षेत्र, झुग्गी-झोपड़ी, स्ट्रीट वेंडर्स, कुछ संस्थान आदि।
- अपवाद: कोर्ट के निर्देश पर कार्रवाई हो सकती है, लेकिन MCD आदि एजेंसियां खुद पहल नहीं करतीं (एक्ट का हवाला देती हैं)।
- उद्देश्य: मास्टर प्लान के अनुसार व्यवस्थित विकास तक अस्थायी राहत, लेकिन समस्या का स्थायी हल नहीं हुआ।
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