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जागरण पड़ताल: यूपी के इस सरकारी अस्पताल में आग बुझाने के सभी संसाधन FAIL, एक्सपायर हुए अग्निशामक यंत्र

cy520520 2025-12-20 21:07:23 views 1230
  



जागरण संवाददाता, बलिया। मरीजों को मुफ्त और सरकारी इलाज मुहैया कराने वाले जिला अस्पताल में आग बुझाने के सभी संसाधन फेल हो चुके है। अस्पताल में लगे अग्निशामक यंत्र भी एक्सपायर हो चुके है। जबकि आग बुझाने के लिए बाल्टियों में बालू की बजाय रद्दी और कबाड़ भरा है। इतना ही नहीं, बिल्डिंग में आटोमैटिक वाटर सप्लाई के लिए बिछाई गई लाइन भी जंक खा चुकी है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

अगलगी के बाद सुरक्षा के मानकों में अस्पताल के डाक्टर, कर्मचारियों और हजारों मरीजों पर तलवार लटकी हुई है। ऐसे में आग लगने से बड़ा हादसा टाला नहीं जा सकता। देश के कई सरकारी अस्पतालों पिछले दिनों हुई आगलगी की घटनाओं में निर्दोष मरीजों की मौत के बाद भी अस्पतालों में सुरक्षा को लेकर गंभीरता नहीं आई है। आलम यह है कि रोजाना दो हजार की ओपीडी और पांच सौ से अधिक आईपीडी मरीजों का इलाज करने वाले जिला अस्पताल में आगलगी से बचाव के काई संसाधन नहीं है। अगर आगलगी जैसी कोई दुर्घटना हुई तो यहां स्थिति पर काबू पाना बड़ी चुनौती साबित होगा।

आग बुझाने के यंत्रों की समाप्त हुई अवधि
बलिया: जिला अस्पताल की इमरजेंसी में आग बुझाने के लिए अग्निशाम यंत्र तो लगे है। लेकिन उनकी अवधि समाप्त हो चुकी है। पिछले वर्ष भरवाए गए छ: किलो के सिलेंडर की रिफिलिंग डेट फेल हो चुकी है। ऐसे में आग लगने के दौरान यह यंत्र बेकार है।

बालू की बाल्टियों में भरी रद्दी और कचरा
बलिया: जिला अस्पताल की इमरजेंसी के गलियारे में आग बुझाने के लिए पारंपरिक तरीकों के रुप8 में बालू भरी बाल्टियां लगाई गई है। लेकिन विभागीय उपेक्षा के कारण इन बाल्टियों में रद्दी और कचरा भरा हुआ है। ऐसे में आग बुझाने के संसाधन फेल है।

जंक खा चुकी वाटर सप्लाई की पाइपलाइन
बलिया: नए परिसर स्थित चार मंजिला इमारत में आग बुझाने के लिए वाटर सप्लाई की पाइपलाइन तो बिछी है। लेकिन वह जंक खा चुकी है। इस बिल्डिंग में पैथोलाजी, अल्ट्रासाउंड, एक्सरे, सीटी स्कैन, डायलिसिस के अलावा हड्डी, सर्जीकल और बच्चा वार्ड भी है। जिनपर खतरा मंडरा रहा है।

तीन महीने से फेल पड़े संसाधन

बलिया: जिला अस्पताल के मेडीकल वार्ड में लगे अग्निशामक यंत्र पिछले तीन महीने से फेल पड़े है। यहां दो वार्डो में करीब 40 मरीज भर्ती रहते है। जबकि आयुष विंग और स्पेशल वार्ड में अक्सर मरीजों का आवागमन लगा रहता है। ऐसे में दुर्घटना की संभावना बनी है।
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