search

ट्रायल कोर्ट के निर्णय पर बिफरा HC, कहा- यह दिनदहाड़े न्यायिक हत्या का मामला

LHC0088 3 hour(s) ago views 769
  

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण



विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में मृत व्यक्ति के खिलाफ पारित डिक्री को कानूनन शून्य करार देते हुए ट्रायल कोर्ट के विरुद्ध बेहद सख्त टिप्पणी की है।

न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने नगर निगम गाजियाबाद की अपील स्वीकार करते हुए निर्णय को दिनदहाड़े न्यायिक हत्या का मामला निरूपित किया है। साथ ही विवादित निर्णय व डिक्री रद कर तत्कालीन सिविल जज (सीनियर डिवीजन) जसवीर सिंह यादव के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की संस्तुति की है।

उन्होंने पत्रावली मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया है। मुकदमे के तथ्यों के अनुसार इंद्रमोहन सचदेव ने दावा किया था कि वह आनंद इंडस्ट्रियल एस्टेट जीटी रोड गाजियाबाद स्थित प्लाट संख्या नौ के मालिक हैं।

यह अधिकार उन्हें वर्ष 2022 में एक अन्य वाद में पारित एकपक्षीय डिक्री के आधार पर मिला है। इसे किसी ने चुनौती नहीं दी। उन्होंने नगर निगम में नाम दर्ज करने के लिए आवेदन दिया। कार्रवाई नहीं हुई तो निषेधाज्ञा का वाद दायर किया। इसे सिविल जज सीनियर डिवीजन ने 13 मई, 2025 को स्वीकार कर लिया। इस आदेश को नगर निगम ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।

कहा कि जिस वाद में इंद्रमोहन सचदेव का स्वामित्व घोषित किया गया है, उसमें प्रतिवादी सुशीला मेहरा की मृत्यु पहले ही हो गई थी। ऐसे में वर्ष 2019 में दर्ज मुकदमे में 2022 में एकपक्षीय डिक्री पारित किया जाना सही नहीं था।

यह भी पढ़ें- यूपी में जल सुरक्षा की बड़ी पहल: 38 जिलों में नाविकों और यात्रियों को मिलेंगी 66 हजार से ज्यादा लाइफ जैकेट

हाई कोर्ट ने कहा है कि सुशीला मेहरा के मृत्यु प्रमाण पत्र को नजरअंदाज करने के लिए दिया गया कारण चौंकाने वाला, विकृत और बाहरी विचारों से दूषित है। इसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए। यह न्यायिक कदाचार है और न्यायाधीश की सत्यनिष्ठा पर संदेह पैदा करता है।

कोर्ट ने कहा, मामले ने अंतरात्मा झकझोर दी है। कोई न्यायाधीश वादी को गलत लाभ पहुंचाने के लिए इस तरह कैसे कार्य कर सकता है? तथ्य स्वयं ही स्पष्ट हैं कि किस प्रकार कानून का खुलेआम उल्लंघन कर न्याय से वंचित किया गया है।

वादी के पिता परमानंद ने वर्ष 1969 में सुशीला मेहरा से विवादित संपत्ति किराये पर ली थी। वर्ष 1996 तक किराया दिया। उसके बाद प्रतिकूल कब्जे के कारण मालिक बनने के बाद कोई किराया नहीं दिया। कोर्ट ने कहा, यह सर्वविदित है कि विवादित संपत्ति में किरायेदार प्रतिकूल कब्जे के आधार पर उस संपत्ति पर स्वामित्व का दावा करने का हकदार नहीं है।   
like (0)
LHC0088Forum Veteran

Post a reply

loginto write comments
LHC0088

He hasn't introduced himself yet.

510K

Threads

0

Posts

1610K

Credits

Forum Veteran

Credits
166044