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बाघा जतिन एक्सप्रेस से 13 जिंदा कछुए बरामद; दक्षिण पूर्व रेलवे ने वन्यजीवों के अवैध व्यापार पर कसा शिकंजा

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बाघा जतिन एक्‍सप्रेस से बरामद कछुए के साथ आरपीएफ की टीम।


जागरण संस, खड़गपुर। दक्षिण पूर्व रेलवे के खड़गपुर डिवीजन और आरपीएफ पोस्ट हिजली के जवानों ने वन्यजीव तस्करी के खिलाफ कार्रवाई की है। हिजली रेलवे स्टेशन पर चलाए गए एक विशेष ज्वाइंट ड्राइव के दौरान ट्रेन संख्या 18044 (बाघा जतिन एक्सप्रेस) से 13 जिंदा कछुए बरामद किए गए हैं।  
लावारिस बैग में मिले दुर्लभ कछुए यह कार्रवाई स्टेशन परिसर में अनाधिकृत प्रवेश, मादक पदार्थों (NDPS) की रोकथाम और वन्यजीव तस्करी को रोकने के उद्देश्य से की गई थी। जानकारी के अनुसार, बाघा जतिन एक्सप्रेस सुबह लगभग 09:35 बजे हिजली स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 1 पर पहुंची।    तलाशी अभियान के दौरान जब आरपीएफ की टीम पीछे के जनरल कोच में दाखिल हुई, तो टॉयलेट एरिया के पास एक संदिग्ध भूरे रंग का जूट का बैग मिला। टीम ने कोच में मौजूद यात्रियों से बैग के मालिकाना हक के बारे में पूछताछ की, लेकिन किसी ने भी बैग पर अपना दावा नहीं किया।  
वन विभाग को सौंपे गए कछुए संदेह होने पर जब बैग की जांच की गई, तो उसके भीतर 13 जिंदा कछुए पाए गए। आरपीएफ कर्मियों ने तुरंत कछुओं को सुरक्षित किया और हिजली चौकी ले आए।    घटना की सूचना तत्काल वन विभाग (फॉरेस्ट डिपार्टमेंट) को दी गई। हिजली फॉरेस्ट रेंज के अधिकारियों की मौजूदगी में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act) के तहत आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की गईं और सभी कछुओं को आगे की कार्रवाई के लिए वन विभाग को सौंप दिया गया।  
रेलवे की कड़ी प्रतिबद्धता आरपीएफ अधिकारियों ने बताया कि यह कार्रवाई रेलवे परिसर में कानून व्यवस्था बनाए रखने और वन्यजीवों के अवैध व्यापार को रोकने के प्रति दक्षिण पूर्व रेलवे की शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति को दर्शाती है।   हालांकि, इस मामले में फिलहाल किसी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है, लेकिन पुलिस आसपास के स्टेशनों के सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों के जरिए तस्करों की पहचान करने में जुट गई है।  
आखिर क्यों होती है कछुओं की तस्करी? रेलवे और वन विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, कछुओं की तस्करी के पीछे कई अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय कारण हैं, जो इस अवैध कारोबार को करोड़ों का बाजार बनाते हैं:

  •     मांस और स्वाद का शौकीन होना: \“सॉफ्ट शेल\“ प्रजाति के कछुओं के मांस की दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत के कुछ हिस्सों में भारी मांग है। तस्कर इन्हें ऊंचे दामों पर होटलों और मांस प्रेमियों तक पहुंचाते हैं।  
  •     अंधविश्वास और शक्तिवर्धक दवाएं: कई देशों में यह माना जाता है कि कछुए के मांस या उसके अंगों से बनी दवाओं से शारीरिक शक्ति बढ़ती है। पारंपरिक दवाओं (Traditional Medicines) में इनके खोल (Shell) का उपयोग किया जाता है।  
  •     फेंगशुई और ज्योतिषीय मान्यताएं: घर में जिंदा कछुआ रखने को सौभाग्य और लंबी उम्र का प्रतीक माना जाता है। इस अंधविश्वास के कारण दुर्लभ प्रजाति के कछुओं की \“पेट मार्किट\“ (Pet Market) में अवैध रूप से बड़ी मांग रहती है।  
  •     कॉस्मेटिक्स और सजावटी सामान: कछुओं के खोल का उपयोग कई बार महंगे सजावटी सामान, चश्मों के फ्रेम और सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में भी किया जाता है।  
  •     बड़ा मुनाफा और कम जोखिम: जंगलों या नदियों से कछुओं को पकड़ना आसान होता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक दुर्लभ कछुए की कीमत हजारों से लाखों रुपये तक हो सकती है, जिससे छोटे अपराधी इस धंधे की ओर आकर्षित होते हैं।
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