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झारखंड में 30000 से अधिक वृक्षों की होगी जेनेटिक मैपिंग, 100 साल पहले के मौसम का मिलेगा हाल

Chikheang 3 hour(s) ago views 487
  

30 हजार से अधिक पुराने वृक्षों की जेनेटिक मैपिंग। (AI Generated Image)



राज्य ब्यूरो, रांची। राज्य के 30 हजार से अधिक पुराने वृक्षों की जेनेटिक मैपिंग यानी आनुवांशिक अध्ययन से वनों में मौजूद मिट्टी की प्रकृति और 100 सालों में यहां के मौसम में आए बदलाव का अध्ययन किया जाएगा।

केंद्र सरकार ने इसके लिए विस्तृत योजना बनाई है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने राज्य में पुराने वृक्षों की पहचान करने और उनका जेनेटिक कोड डाटाबेस बनाने के लिए वनस्पतिशास्त्र के विशेषज्ञों से कहा है।  

झारखंड में पारिस्थितिकी संतुलन पर काम कर चुके दिल्ली विश्वविद्यालय के रिसर्च फेलो विवेक चौधरी ने बताया कि इस महत्वाकांक्षी योजना से जंगलों में मौजूद वाटर बॉडी की जानकारी भी मिलेगी।

इसके अलावा वृक्षों की वृद्धि और उनके चिरायू होने के कारणों को भी समझा सकेगा। चौधरी ने बताया कि राज्य में पिछले सौ सालों में मौसम बदला है। इसके साथ मिट्टी भी अपरदन का शिकार हुई है।

वृक्षों का अपना कम्यूनिकेशन सिस्टम होता है। इनके आनुवांशिक अध्ययन से किस अवधि में कौन सा मौसम प्रभावी रहा इसकी जानकारी मिलेगी।
राज्य की पारिस्थितिकी में कौन से वृक्ष अनुकूल हैं यह जाना जाएगा

झारखंड के लिए साल, शीशम, गम्हार और महुआ जैसी इमारती लकड़ियों वाले वृक्ष प्राकृतिक तौर पर उगते हैं। लेकिन पिछले करीब 25 सालों से इनका सामान्य उद्भव यानि प्राकृतिक विकास नहीं हो रहा है।

यह बदलते मौसम और मिट्टी के पोषक तत्वों में बदलाव की वजह से हो रहा है। 30 हजार वृक्षों के जनेटिक अध्ययन से इसके लिए जिम्मेदार तत्वों की पहचान होगी। इसके बाद राज्य की मिट्टी में कौन से वृक्ष स्वत: विकास कर सकते हैं इसका पता चलेगा।
रांची से सटे जंगलों में संतुलित है पारिस्थितिकी

पर्यावरणविद और रांची विश्वविद्यालय में भूगर्भ शास्त्र के प्राध्यापक नीतीश प्रियदर्शी ने बताया कि वाटर बाडी या जल स्रोत का वृक्षों के स्थायी रहने में महत्वपूर्ण स्थान है।

रांची के पास जो जंगल या वृक्ष हैं उन्हें कई वाटर बाडी से नमी मिल जाती है। इसलिए अनगढ़ा से लेकर ओरमांझी तक प्राकृतिक तौर पर भी पौधे उग रहे हैं।

केंद्र सरकार के अध्ययन को राज्य के वन एवं पर्यावरण विभाग से भी शेयर किया जाएगा। इससे पौधों के विकास और संरक्षण में आसानी होगी। सारंडा और साहिबगंज के जंगलों में अभी भी पुराने वृक्ष मौजूद हैं और इनका डाटा भी उपलब्ध है।

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