सावधान! बच्चों की शब्दावली हो रही है कम (Image Source: Freepik)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ऑक्सफोर्ड की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, 40% छात्र शब्दावली विकास में पिछड़ गए हैं। डिजिटल दुनिया बच्चों के पढ़ने का वक्त छीन रही है, लेकिन घबराने की बात नहीं है क्योंकि इस समस्या से निपटने के लिए दुनिया भर में कुछ बेहद अनोखे और दिलचस्प प्रयोग किए जा रहे हैं।
खाने के साथ आसान हो रही पढ़ाई
बच्चों में शब्दों के प्रति फिर से प्यार जगाने के लिए सूजी डेंट ने एक शानदार अभियान शुरू किया है। अब बच्चों का \“लंच बॉक्स\“ ही उनकी क्लासरूम बन रहा है। एक फूड ब्रांड के साथ मिलकर बच्चों के टिफिन में मजेदार शब्दों वाले कार्ड रखे जा रहे हैं।
इन कार्ड्स पर नए शब्द, उनके सरल अर्थ और उनसे जुड़ी दिलचस्प कहानियां लिखी होती हैं। इससे पढ़ाई बोझ नहीं, बल्कि एक खेल बन जाती है। यह तरीका न केवल बच्चों का शब्दकोष बढ़ाता है, बल्कि डाइनिंग टेबल पर माता-पिता और बच्चों के बीच बातचीत को भी बढ़ावा देता है।
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\“ह्यूमन लाइब्रेरी\“ की पहल
क्या आपने कभी ऐसी लाइब्रेरी देखी है जहां अलमारियों में किताबें ही न हों? जी हां, \“ह्यूमन लाइब्रेरी\“ का कांसेप्ट यही है। यहां बच्चे किताबों की जगह लोगों से बात करते हैं। बातचीत के जरिए वे शब्दों के असली अर्थ, उनका सही रेफरेंस और इस्तेमाल सीखते हैं। यह तरीका सीखने की प्रक्रिया को जीवंत बना देता है। सन 2000 में डेनमार्क से शुरू हुई यह अनोखी पहल आज दुनिया के 85 से ज्यादा देशों में बच्चों की भाषा सुधार रही है।
दुकानों के बोर्ड और ट्रैफिक सिग्नल से सीखना
पढ़ाई सिर्फ क्लासरूम तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में बच्चों को क्लास से बाहर ले जाकर सिखाया जा रहा है। बच्चे अपने आसपास की दुकानों के बोर्ड और ट्रैफिक संकेतों को पढ़कर नए शब्द सीख रहे हैं। इससे उन्हें समझ आता है कि शब्द केवल किताबों में नहीं, बल्कि हमारे आसपास की हर चीज में मौजूद हैं और यह उन्हें बाहरी दुनिया से जोड़ता है।
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नन्हे पॉडकास्टर्स और रोबोटिक दोस्त
आजकल स्कूलों में बच्चों को खुद के \“पॉडकास्ट\“ बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। छोटे-छोटे विषयों पर बोलने से उनमें शब्दों के सही चयन और विचारों को व्यवस्थित करने की कला विकसित होती है।
इसके अलावा, टेक्नोलॉजी भी एक बड़ा रोल निभा रही है। कहानी सुनाने वाले रोबोट अब बच्चों के नए दोस्त हैं। ये रोबोट बच्चे की भाषा क्षमता को समझकर उसी स्तर की कहानियां सुनाते हैं और बीच-बीच में सवाल भी पूछते हैं। यह \“पर्सनल लर्निंग\“ का बेहतरीन उदाहरण है। भारत समेत अमेरिका, जापान, चीन और फिनलैंड जैसे कई देशों में इन रोबोटिक दोस्तों का प्रयोग हो रहा है।
भले ही स्क्रीन टाइम ने बच्चों की पढ़ने की आदत को कम किया हो, लेकिन टिफिन में छिपे शब्दों से लेकर रोबोटिक कहानियों तक, ये नए प्रयोग उम्मीद की एक नई किरण लेकर आए हैं। जरूरत है बस इन तरीकों को अपनाने और बच्चों को शब्दों की जादुई दुनिया में वापस लाने की।
Reference:
Oxford Language Report 2023
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