बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक लेना पड़ सकता है भारी (फाइल फोटो)
जागरण संवाददाता, यमुनानगर। बिना डाक्टर की पर्ची के बिक रहे एंटी बायोटिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। इनकी बिक्री को लेकर नियम हैं लेकिन नियमों की पालना नहीं हो रहा है। लोग भी डाक्टर के पास जाने के बजाय जल्दी ठीक होने के चक्कर में अपने नजदीकी केमिस्टों से दवाई लेते हैं जो उन्हें एंटी बायोटिक देते हैं।
पूरी डोज तक नहीं दी जाती। इसके लिए ही दैनिक जागरण की ओर से एएमआर(एंटी बायोटिक रेजिस्टेंस) को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत उप जिला नागरिक अस्पताल में कार्यक्रम हुआ। जिसमें चिकित्साधीक्षक डॉ. अनुज मंगला ने लोगों को जागरूक किया।
डॉ. अनुज मंगला ने कहा कि बिना कारण एंटी बायोटिक लेना सबसे खतरनाक है। डाक्टर यदि खुराक के साथ मरीज को एंटी बायोटिक देता है तो वह एक डोज देता है। यदि इससे कम या अधिक हो तो शरीर में एंटी बायोटिक प्रतिरोध बन जाते हैं। जिससे शरीर पर दवाइयां असर नहीं करती। मरीज उस समय ठीक भी हो जाता है तो बाद में उसे कभी बीमारी होने पर एंटी बायोटिक असर नहीं करता।
जिससे उसे महंगी दवाइयां लेनी पड़ती है। इसलिए डाक्टर की पर्ची के बिना दवाइयां न लें। अक्सर लोग यह सोचते हैं कि डाक्टर के पास जाएंगे तो वहां पर्ची बनवाने व डाक्टर को दिखाने में काफी समय जाएगा। हल्का खांसी बुखार है। यह मेडिकल से दवाई लेकर ठीक हो जाएगा।
ऐसे में उन्हें बेवजह एंटी बायोटिक दे दी जाती है। मरीज भी उसका पूरा कोर्स नहीं करता। यह गलत है। सरकारी अस्पताल में मरीज का इलाज निश्शुल्क है। ऐसे में बिल्कुल भी लापरवाही न बरतें। कोई भी परेशानी होने पर डाक्टर के पास पहुंचकर जांच कराएं। जिससे मरीज का सही इलाज होगा।
कार्यक्रम के दौरान मरीजों ने सवाल भी पूछे। एक डाक्टर ने कहा कि केमिस्ट के पास जाते हैं तो वह दवाई दे देते हैं। हमें नहीं पता होता कि कौन सी दवाई दी है। यदि अस्पताल में आते हैं तो यहां पर काफी समय लग जाता है। डॉ. अनुज मंगला ने कहा कि यह समय भले लगे लेकिन मरीज को दवाई सही मिलेगी। जिस समय व खर्च से बच रहे हो।
उससे अधिक रुपये लग जाएंगे। सही दवा न मिलने से बीमारी बढ़ जाएगी। विदेशों में एंटी बायोटिक को लेकर कड़े नियम हैं। यहां अक्सर लोग अपनी मर्जी से दवाई ले लेते हैं। जिससे दिक्कत बढ़ती है। अस्पताल में भी इस तरह के मरीज आते हैं जो पहले केमिस्टों या फिर झोलाझाप से दवाई ले चुके होते हैं। बाद में बीमारी बढ़ने पर यहां पहुंचते हैं। |
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