चिकित्सा स्वास्थ्य महानिदेशालय में संयुक्त निदेशक चिकित्सा उपचार डॉ सीएस बाजपेई
राज्य ब्यूरो, जागरण, लखनऊ: एंटीबायोटिक्स का वर्ष 1928 में अविष्कार हुआ था। अब हम इसकी पांचवी पीढ़ी तक पहुंच गए हैं, लेकिन अब इलाज में इसके इस्तेमाल को लेकर गंभीर होने की जरूरत है।
एंटीबायोटिक्स के अधिक इस्तेमाल का पूरी एक पीढ़ी पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। जरूरी हो गया है कि मरीज, डाक्टर और दवा विक्रेता जागरूक हों और एंटीबायोटिक्स के बढ़ते प्रतिरोध (रजिस्टेंस) को रोका जा सके।
चिकित्सा स्वास्थ्य महानिदेशालय में संयुक्त निदेशक चिकित्सा उपचार डॉ सीएस बाजपेई ने सोमवार को जागरण की संपादकीय टीम के साथ एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल और बिक्री को लेकर वार्ता की। डॉ बाजपेई के अनुसार डाक्टर को समझना होगा कि उसे मरीज को बिना जरूरत एंटीबायोटिक्स नहीं देनी है। इसी तरह मरीज या आम आदमी को जागरूक होना होगा कि वह डाक्टर से यह पूछ सके कि उसे एंटीबायोटिक्स क्यों दी जा रही है।
दवा विक्रेता को जागरूक होना होगा कि कोई उसके पास गैर जरूरी दवा खरीदने आता है तो, वह उससे डाक्टर का पर्चा जरूर मांगे। जिससे एंटीबायोटिक्स के बिना जरूरत इस्तेमाल से बचा जा सके। उन्होंने बताया कि सामान्य सर्दी, जुखाम, बुखार में शुरुआती तीन दिन तक किसी भी तरह की एंटीबायोटिक दवा देने की जरूरत नहीं होती हैं।
इसके बाद यदि बीमारी ठीक नहीं हो रही हो तभी एंटीबायोटिक देने की जरूरत पड़ती है। मरीज बुखार भी ठीक न होने पर तुरंत डाक्टर बदल देता है। मरीज की जल्दी ठीक होने की इच्छा के कारण डाक्टर भी एंटीबायोटिक देने से परहेज नहीं कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि आइसीयू में एंटीबायोटिक्स के प्रतिरोध को रोकने के लिए भी पालिसी बनी हुई है। बड़े चिकित्सा संस्थानों और अस्पतालों में एंटीबायोटिक्स के प्रतिरोध को रोकने के लिए समय-समय पर वार्ड, आपरेशन थिएटर के नमूने लेकर जांच की जाती है।
जिससे मरीज को नुकसान न पहुंचे। भर्ती अति गंभीर मरीज को बिना कल्चर जांच के कोई भी उच्च श्रेणी की एंटीबायोटिक्स नहीं दी जाती है। इसके लिए पूरी गाइड लाइन बनी हुई है। जिसकी पूरी एक टीम देखरेख करती है।
जागरूकता बहुत जरूरी
प्रदेश से पोलियो जैसी बीमारी जागरूकता के कारण ही खत्म हो गई है। एक वाक्य \“\“दो बूंद जिंदगी की\“\“ का असर कितना है, इसे पोलियो के खात्मे से देखा जा सकता है। इसी तरह डायरिया से होने वाली मौतों पर सिर्फ ओआरएस घोल पीने की जागरूकता होने के कारण काबू पाया जा सका है।
इसी जागरूकता की जरूरत एंटीबायोटिक्स के बिना जरूरत इस्तेमाल को रोकने की है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को लेकर वर्ष 2025 में दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसका पालन करना सभी चिकित्सकों के लिए जरूरी है।
डॉक्टर की भूमिका
- मरीज को बैक्टीरियल संक्रमण है, तभी मरीज को एंटीबायोटिक्स लेने की सलाह दें
- लक्षणों के आधार पर सुनिश्चित करें कि मरीज को बैक्टीरियल संक्रमण है, जरूरत पड़ने पर कल्चर टेस्ट कराएं
- संक्रमण और गंभीरता के अनुसार सही एंटीबायोटिक्स की खुराक तय करें
- मरीजों को बताएं कि उसे यह दवा क्यों लेना जरूरी है
- किस तरह से उसका सेवन करना है
- उसका निश्चित समय तक खाना क्यों जरूरी है।
मरीज की भूमिका
- मरीज को यह पूछने का हक है कि क्या उसे एंटीबायोटिक की जरूरत है
- अपनी शंका का समाधान जरूर करें
- डॉक्टर जो भी दवा दे रहा है, उस बताए गए नियम और समय के अनुसार ही खाएं
- स्वयं एंटीबायोटिक न खरीदें और न ही एक ही बीमारी समझकर दूसरे की दवा खाएं
- दवा लेने के बाद त्वचा पर लाल चकत्ते या कोई दुष्प्रभाव महसूस हो रहा है तो तुरंत डाक्टर को जरूर बताएं
- इलाज और दवा खाना बिना डाक्टर की सलाह के न बंद करें।
इलाज के बीच में दवा छोड़ना नुकसानदेय
टीबी बीमारी का उदाहरण देते हुए डॉ सीएस बाजपेई ने बताया कि बीच में इलाज बंद कर देने से मरीज को मल्टी ड्रग रजिस्टेंस (एमडीआर टीबी) हो जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि टीबी की दवा शुरू करने के दो से तीन सप्ताह में मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार होता है। उसे भूख लगना शुरू हो जाती है, शरीर स्वस्थ लगने लगता है। ऐसे में वह दवा खाने में लापरवाही करता है। जबकि उसे लगातार दवा नियम से खानी होती है। सामान्य टीबी की बीमारी की दवा बीच में छोड़ने पर मरीज को उस दवा के प्रति रजिस्टेंस हो जाता है और उसे दूसरी दवाएं देनी पड़ती हैं। |
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