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Bihar Politics: सेना के बेस कैंप पर सियासत! कांग्रेस और AIMIM का साथ देने से हिचक रही RJD

cy520520 2026-1-2 21:27:19 views 976
  

बेस कैंप मामले में साथ देने से हिचक रहा राजद। (फाइल फोटो)



राज्य ब्यूरो, पटना। बांग्लादेश की सीमा के निकटस्थ किशनगंज में आर्मी कैंप का बनना तय है। इसके लिए चिह्नित लगभग 250 एकड़ भूखंड को खेतिहर बताते हुए स्थानीय लोग विरोध जता रहे, जिनमें अधिसंख्य मुसलमान हैं।

किशनगंज के कांग्रेस सांसद मो. जावेद संसद में यह मुद्दा उठा चुके हैं और जिलाधिकारी से मिलकर हस्तक्षेप का आग्रह कर चुके हैं।

समर्थन में एआईएमआईएम भी आ चुकी है। कांग्रेस चाहती है कि मतदाता-सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की तरह इस मुद्दे पर भी राजद और वामदल मुखर हों, लेकिन एसआईआर का विरोध कर विधानसभा चुनाव में पछाड़ खा चुका राजद कदम आगे बढ़ाने से हिचक रहा।

कैंप का विरोध करने पर राष्ट्रीय सुरक्षा की अनदेखी और राष्ट्रहित के कार्यों में अड़ंगा डालने का आरोप लग सकता है। सतभिट्ठा, सकोर और नटुआपारा मौजा में 250 एकड़ रकबा में कैंप बनाने का प्रस्ताव है। ये मौजा किशनगंज जिला में कोचाधामन और बहादुरगंज अंचल के सीमावर्ती हैं।

लगभग डेढ़ दर्जन गांवों के दायरे वाले उस भूभाग के बड़े हिस्से में खेती होती है। इसीलिए किसान उसे छोड़ना नहीं चाहते। उनका कहना है कि बंजर या कम उपयोगी भूखंड का चयन होना चाहिए। बेलुआ में 1200 एकड़ सरकारी भूखंड है, जहां कैंप बनाया जा सकता है। इसी बहाने कांग्रेस और एआईएमआईएम के लिए राजनीति का अवसर बन आया है।

इस बार के चुनाव में कांग्रेस को सर्वाधिक सफलता सीमांचल में ही मिली है और बिहार में सीमांचल से आगे एआईएमआईएम प्रभावी नहीं। स्थानीय हितों की दुहाई का यह बड़ा कारण है।

चार जिलों (किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, कटिहार) वाला सीमांचल सामरिक दृष्टिकोण से बिहार का चिकन-नेक है, क्योंकि यह नेपाल के साथ बांग्लादेश की सीमा के निकटस्थ है। किशनगंज से बांग्लादेश की सीमा 20 किलोमीटर से कुछ कम ही है।
किशनगंज में मुसलमानों की संख्या सर्वाधिक

भाजपा बहुत पहले से यह दावा करती रही है कि घुसपैठ के कारण सीमांचल का जनसांख्यिकी स्वरूप बिगड़ता जा रहा। उल्लेखनीय है कि देश में लद्दाख के बाद किशनगंज दूसरा जिला है, जहां मुसलमानों की संख्या सर्वाधिक है। पड़ोसी बंगाल के मालदा और उत्तर दिनाजपुर जिला में भी मुसलमानों की उपस्थिति बहुतायत है।

मालदा तो घुसपैठियों का गढ़ बनता जा रहा है। इसी कारण केंद्र सरकार ने आर्मी कैंप के लिए किशनगंज को अनुकूल पाया है, जहां से पूरे परिक्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है। सेना के अधिकारी स्थल का निरीक्षण कर गए हैं और सरकार भू-स्वामियों को निर्धारित मुआवजा देने के लिए प्रतिबद्ध है।

इसके बावजूद कांग्रेस और एआइएमआइएम अंदरखाने इस हथकंडे में लगे हैं कि राजद और वामदल भी इस मुद्दे पर मुखर हो जाएं और इसके विरुद्ध एक मंच से आंदोलन छेड़ा जाए।
राष्ट्र-हित और राजनीति के द्वंद्व की बातें

मो. जावेद बता रहे कि जिलाधिकारी से उन्होंने आग्रह किया है कि ऐसे भूखंड का चयन हो, जो आर्मी कैंप के लिए उपयुक्त भी हो और जहां से कम-से-कम विस्थापन की स्थिति बने।

बहादुरगंज से एआईएमआईएम के विधायक मो. तौसीफ आलम तो फसली भूमि बचाने के लिए आखिरी हद तक आंदोलन की चेतावनी दे रहे। हालांकि, राजद के प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन इसे संवेदनशील मुद्दा बता रहे। उनका कहना है कि ऐसे मुद्दों पर आंदोलन से पहले जन-हित और राष्ट्र-हित का आकलन आवश्यक होता है। बिहार के हित में मुद्दोंं के चयन में राजद का शीर्ष नेतृत्व दूसरे दलों की अपेक्षा अधिक सक्षम है।

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