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खुद की फार्मेसी फिर भी जड़ी-बूटियां फांक रहीं धूल: 19 जिलों को दवा देने वाली यूनिट खुद लाचार!

Chikheang 2026-1-2 07:26:54 views 427
  

कपड़े से ढकी रखीं आयुर्वेद‍िक दवाएं



जागरण संवाददाता, पीलीभीत। सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की विसंगतियां कितनी गहरी और विरोधाभासी हो सकती हैं। इसका उदाहरण जनपद की राजकीय आयुर्वेदिक फार्मेसी में देखने को मिल रहा है। जो संस्थान पश्चमी प्रदेश के 19 जिलों के सरकारी अस्पतालों की सेहत सुधारने के लिए दवाओं की आपूर्ति का जिम्मेदार है, वह खुद दवा तैयार करने में लाचार नजर आ रहा है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

विडंबना देखिए कि जब फार्मेसी ने हाथ खड़े किए और विकल्प के तौर पर बाहर से दवाएं खरीदी गईं, तो गुणवत्ता जांच में उनके सैंपल फेल पाए गए। यानी सरकारी खजाने को चपत भी लगी और मरीजों तक मानक विहीन औषधियां पहुंचने का खतरा भी बढ़ गया। वर्ष 1899 में स्थापित राजकीय आयुर्वेदिक कालेज के साथ ही इस फार्मेसी की नींव रखी गई थी।

नो प्राफिट-नो लास के सिद्धांत पर चलने वाली यह फार्मेसी दशकों तक औषधियों का भंडार रही है। पहले यह कालेज प्राचार्य के अधीन थी, लेकिन अब स्वतंत्र अधीक्षक के अधीन है। आलम यह है कि अस्पताल के पास अश्वगंधा और पंचसकार चूर्ण सहित करीब 20 जड़ी-बूटी तैयार करने के लिए करीब 30 क्विंटल से अधिक बेशकीमती जड़ी-बूटियां रखी हैं, लेकिन फार्मेसी उन्हें पीसने को तैयार नहीं है।

समय पर पिसाई न होने के कारण कैंपस में रखी ये जड़ी-बूटियां अब नमी की भेंट चढ़ रही हैं। अश्वगंधा और पंचसकार सहित करीब 20 औषधियों की पिसाई की जानी है। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि फार्मेसी स्टाफ अन्य जिलों की सप्लाई का हवाला देकर स्थानीय अस्पताल की जड़ी-बूटियां पीसने से मना कर देता है।

नतीजा यह है कि अस्पताल आने वाले गरीब मरीज मजबूरी में बाहरी मेडिकल स्टोर से महंगी दवाएं खरीदने को विवश हैं। राजकीय आयुर्वेदिक कालेज में दवाओं की गुणवत्ता के साथ खेल स्वाद, गंध और रंग के भरोसे चल रही है। हाल ही में स्फटिक भस्म, टंकन भस्म, श्वेता पार्पति, लशुनादि वटी और लवंगादि वटी दवाओं के सैंपल फेल हो गए हैं।

हैरानी की बात यह है कि इन दवाओं की गुणवत्ता की जांच वैज्ञानिक पद्धति या अत्याधुनिक लैब के बजाय केवल स्वाद, गंध और रंग के आधार पर की गई। नियम कहता है कि दवाओं के मानक तय करने के लिए उन्हें सरकारी लैब में टेस्ट कराया जाना चाहिए, लेकिन यहां केवल इंद्रियों के भरोसे रिपोर्ट तैयार कर दी गई। हालांकि आपूर्ति करने वाली कंपनी ने लैब टेस्ट रिपोर्ट साथ देने का दावा किया है, लेकिन कालेज स्तर पर बिना वैज्ञानिक परीक्षण के दवाओं को फेल या पास करार देना पूरी प्रक्रिया को संदिग्ध बनाता है।
जरूरत के हिसाब से पीसी जा रहीं दवाइयां

फार्मेसी अधीक्षक प्रकाश चंद का तर्क है कि शासन ने अब फार्मेसी को कालेज से अलग कर दिया है और उन पर पश्चिम उत्तर प्रदेश के 19 जिलों को समयबद्ध दवा उपलब्ध कराने का भारी दबाव है। फार्मेसी में स्टाफ और मशीनों जैसे संसाधनों की भारी कमी है। लेकिन उसके बाद भी अस्पताल के खर्च के अनुसार दवाओं का पिसान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि तकनीकी रूप से फार्मेसी अस्पताल की दवा पीसने के लिए बाध्य है, लेकिन मानवीय आधार पर समन्वय किया जाता है। हाल ही में मशीन खराब होने से संकट और गहरा गया है।

  


कुछ दवाएं अस्पताल में पीसने के लिए पड़ी है, उन्हें पीसने के लिए इंतजाम नहीं हो पा रहे है। पहले फार्मेसी अस्पताल के आधीन होने के चलते परेशानी नहीं हो रही थी। अब परेशानी हो रही है। उच्चाधिकारियों को बताया गया है, जल्द ही इंतजाम किए जा रहे है।

- सुदीप बेदर, प्राचार्य आयुर्वेदिक कालेज।





यह भी पढ़ें- एलोपैथ‍िक के बाद अब आयुर्वेदिक दवाओं में भी मिलावट, स्फटिक और टंकन भस्म समेत 5 दवाएं जांच में फेल
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