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शादी से पहले कन्याओं की महावर से क्यों नहीं जोड़ी जाती एड़ियां? जानिए रोचक वजह

cy520520 2025-12-19 22:37:20 views 698
  

Mahavar Significance: कुंवारी कन्याओं के लिए महावर लगाने के नियम।



धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति में सोलह शृंगार का विशेष महत्व है, जिनमें \“महावर\“ भी शामिल है। आलता के बिना दुल्हन का शृंगार अधूरा माना जाता है। चाहे मांगलिक काम हो या फिर कोई तीज-त्योहार हर शुभ अवसर पर महिलाओं के पैरों में महावर लगाना सौभाग्य और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है, लेकिन आपने गौर किया होगा कि जब कुंवारी कन्याओं के पैरों में महावर (Mahavar Significance) लगाया जाता है, तो उनकी एड़ियों को आपस में नहीं जोड़ा जाता यानी एड़ी के पीछे वाले हिस्से को खुला छोड़ दिया जाता है। आइए इसके पीछे छिपे धार्मिक कारण को जानते हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

  

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पूर्णता का प्रतीक

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पैरों की एड़ियों का महावर से जुड़ना \“पूर्णता\“ का प्रतीक है। कुंवारी कन्या अपने पिता के घर की अमानत होती है और वह वहां से विदा होकर दूसरे घर जाती है। एड़ी न जोड़ने का मतलब यह है कि कन्या का जीवन अभी पूरा नहीं हुआ है और वह ससुराल जाकर अपने नए जीवन की शुरुआत करेगी।
नए जीवन की शुरुआत

शादी से पहले एड़ी का खुला रहना इस बात का संकेत है कि लड़की अभी अपने मायके की मर्यादाओं और बंधनों से जुड़ी है। शादी के दिन जब पहली बार उसकी एड़ियों को महावर से जोड़ा जाता है, तो यह इस बात का प्रतीक होता है कि अब वह एक नए बंधन में बंध चुकी है और उसका गृहस्थ जीवन पूरा होने जा रहा है।
सौभाग्य और सुहाग का प्रतीक

सुहागिन महिलाओं के लिए महावर से जुड़ी हुई एड़ी उनके \“अखंड सौभाग्य\“ का प्रतीक मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि जुड़ी हुई एड़ी पति-पत्नी के अटूट रिश्ते और जीवन की पूर्णता को दिखाती है। हालांकि कुंवारी कन्या का विवाह नहीं हुआ होता, इसलिए उन्हें इसे जोड़ने के लिए मनाही होती है।
महावर लगाने के फायदे

महावर लगाना केवल सौंदर्य का विषय नहीं है, बल्कि इसके कई सारे लाभ भी हैं -

  • शीतलता - महावर पैरों को ठंडक पहुंचाता है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है।
  • त्वचा की सुरक्षा - पुराने समय के महावर में कई औषधीय गुण पाए जाते थे, जिससे पैरों की फटी एड़ियों समेत कई मुश्किलों से छुटकारा मिलता था।

संस्कृति और मर्यादा का सम्मान

भारतीय परंपराओं में हर छोटी रस्म के पीछे एक ठोस वजह और भावना छिपी होती है। महावर की एड़ी न जोड़ना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि कन्या के जीवन के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक जाने की संस्कृति और मर्यादा का सम्मान है। यही वजह है कि आज भी कुक्ष क्षेत्रों में बड़े-बुजुर्ग इस नियम का कड़ाई से पालन करवाते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।
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