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बच्चों के सपनों को नहीं मिल रही उड़ान... हरिद्वार में 50 फीसदी स्कूलों में नहीं हैं खेल मैदान, खेल शिक्षकों का भी टोटा

LHC0088 2025-12-18 13:06:51 views 490
  

मैदान ना होने के कारण बच्चों को इस तरह से छोटे स्थान पर खेलना पड़ रहा है।



जागरण संवाददाता, हरिद्वार। जनपद हरिद्वार के स्कूलों में खेलों की बुनियादी सुविधाओं की स्थिति चिंताजनक है। कुछ स्कूलों को छोड़ दिया जाए जाए तो जनपद के करीब 50 प्रतिशत बेसिक विद्यालयों से लेकर इंटर कॉलेजों तक, बच्चों के शारीरिक विकास और खेल प्रतिभा को निखारने के लिए आवश्यक सुविधाएं या तो नदारद हैं या फिर बदहाली का शिकार हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

कई प्राइवेट स्कूल भी बिना खेल मैदान के संचालित हो रहे हैं। इन स्कूलों पर भी शिक्षा विभाग का नियंत्रण नहीं है। जिले के करीब 50 प्रतिशत विद्यालय ऐसे हैं, जहां खेल मैदान ही उपलब्ध नहीं हैं। जिन स्कूलों में मैदान मौजूद भी हैं, वहां का हाल किसी खेल परिसर से अधिक खाली औपचारिकता जैसा है।

छोटे, संकुचित और असमतल मैदानों में बच्चों से बड़े सपनों की उम्मीद की जा रही है। कई जगहों पर मैदान के नाम पर स्कूल भवनों के बीच की गैलरी है, तो कहीं मैदान ऊबड़-खाबड़ जमीन में तब्दील हैं। कहीं झाड़ियां उगी तो कहीं पत्थर और मलबा बिखरा पड़ा है।

ऐसे में खेल अभ्यास के दौरान बच्चों के चोटिल होने का खतरा हमेशा बना रहता है। स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। अधिकांश विद्यालयों में प्रशिक्षित खेल शिक्षकों के पद रिक्त चल रहे हैं। जहां शिक्षक नहीं, विद्यालयों में खेल केवल समय सारिणी में दर्ज है।

ऐसे में नौनिहालों को सही मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा है, साथ ही नियमित अभ्यास भी नहीं कर पा रहे हैं। परिणामस्वरूप, जिला स्तर, मंडल स्तर और राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में हरिद्वार के कई होनहार छात्र-छात्राएं प्रतिभा होने के बावजूद पीछे छूट जाते हैं।

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शिक्षा विभाग से जुड़े सूत्र बताते हैं कि जिले में विद्यालय वर्षों पुराने हैं। उस दौर में भूमि की उपलब्धता के आधार पर भवन तो बना दिए गए, लेकिन खेल मैदानों को प्राथमिकता नहीं दी गई।

आज जब खेल शिक्षा को राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी विशेष महत्व दिया जा रहा है, तब हरिद्वार के स्कूल इस कसौटी पर कमजोर साबित हो रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि मोबाइल और स्क्रीन से बच्चों को दूर रखने की बात तो हर मंच से होती है, लेकिन जब खेलने के लिए सुविधा की बात होती हैं तो बच्चे कहां खेले।



कुछ विद्यालयों में मैदान व खेल सुविधाओं की कमी है। केंद्र सरकार के आकांक्षी जनपद योजना के बजट से सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। जहां तक प्राइवेट स्कूलों में सुविधाओं का सवाल है, मान्यता के समय प्राइवेट विद्यालयों की रिपोर्ट ब्लॉक से आती है। जिसके आधार पर उन्हें मान्यता दी जाती है।


                                                             आशुतोष भंडारी, मुख्य शिक्षा अधिकारी हरिद्वार
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