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पाकिस्तानी व अफगानी उत्तराखंड में बने भारतीय, बयां की रूह को कंपा देने वाली यादें

deltin33 1 hour(s) ago views 700
  

सांकेतिक तस्वीर।



अवनीश चौधरी, देहरादून। जिंदगी पर खौफ का साया, आंखों में अपनों को खोने का मंजर और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने के लिए रूह को कंपा देने वाली यादें...नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता मिलते ही पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए तमाम परिवारों के चेहरे पर आज जो मुस्कान है, उसके पीछे संघर्ष की एक लंबी और दर्दनाक दास्तान छिपी है।

किसी ने सरेबाजार अपनों को गोलियों से भुनते देखा, तो किसी को धर्म बदलने के लिए प्रताड़ित किया गया। आज इन सभी के लिए 22 से 40 साल का वनवास खत्म हुआ है।
केस स्टडी 1 : जीजा और भाई को सरेबाजार भून दिया था...

पाकिस्तान के भट्टाग्राम से आए बलराम के लिए नागरिकता केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि सुरक्षा का वो कवच है जिसकी तलाश में उन्होंने 22 साल काट दिए।

बलराम बताते हैं कि 1992 की वह घटना आज भी उनके जख्मों को हरा कर देती है। एक बैंक गार्ड ने उनके जीजा जगदीश कुमार और मामा के बेटे कृपा राम सहित चार लोगों की सरेआम हत्या कर दी थी।

  • कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने धर्म परिवर्तन से इन्कार कर दिया था।


बलराम कहते हैं, आरोपी को पांच महीने में जमानत मिल गई, वहां न्याय की उम्मीद नहीं थी। आज नागरिकता मिली है तो सुकून है कि मेरे बच्चों को उस नरक में वापस नहीं जाना पड़ेगा।
केस स्टडी 2: स्कूल में जबरन खिलाते थे मांस, फेल करने की मिलती थी धमकी

43 वर्षीय कृष्ण की कहानी भी मजहबी कट्टरता के जुल्मों से भरी है। पाकिस्तान में अपनी प्राथमिक शिक्षा के दौरान उन्हें दीन की किताबें पढ़ने पर मजबूर किया जाता था।

  • मना करने पर फेल करने की धमकी दी जाती।


कृष्ण बताते हैं कि शाकाहारी होने के बावजूद उनकी सब्जियों में जबरन गो मांस मिला दिया जाता था।

1997 में भारत आने के बाद, कागजों को वैध करने के लिए उन्हें एक बार फिर जान जोखिम में डालकर पाकिस्तान जाना पड़ा, जहां गुरुद्वारे में छिपकर उन्होंने अपने दस्तावेज जुटाए।

आज भारत की नागरिकता पाकर उन्हें असल मायने में आजाद होने का अहसास हो रहा है।
केस स्टडी 3: नागरिकता के इंतजार में माता-पिता गुजर गए, आज उनकी आत्मा को शांति मिलेगी

अफगानिस्तान से मात्र चार साल की उम्र में भारत आए प्रवीण कुमार (51 वर्ष) की पूरी जवानी नागरिकता के इंतजार में बीत गई।

उनके माता-पिता दिल्ली तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते चल बसे, लेकिन अपनी आंखों से बच्चों को भारत का नागरिक बनते नहीं देख सके।

प्रवीण कहते हैं, 40 साल का लंबा इंतजार आज खत्म हुआ। काश आज माता-पिता साथ होते, पर खुशी है कि अब मेरा परिवार चैन की सांस ले सकेगा।
कड़वी यादें पीछे छोड़ देहरादून में बसीं दुर्गा

कराची से 2010 में शादी कर देहरादून आईं दुर्गा नाथ राजपूत पिछले 15 सालों से अपने मायके नहीं गईं।

वहां अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले भेदभाव ने उनके मन में इतनी कड़वाहट भर दी है कि अब वह वापस मुड़कर भी नहीं देखना चाहतीं, हालांकि नागरिकता मिलने की उन्हें बहुत खुशी है, लेकिन कागजी कार्रवाई की पेचीदगियों को लेकर वे थोड़ी चिंतित भी हैं।

कहती हैं, अब वह पूरी तरह भारतीय हैं और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर निश्चिंत हैं, लेकिन दस्तावेज बनवाने में बहुत परेशानी हो रही है।
लूट और कत्लेआम के बीच से बचकर आई थीं

अफगानिस्तान के खोस्ट से आई 46 वर्षीय हंसेरी बाई ने 1992 के उस दौर को याद किया, जब वहां अराजकता चरम पर थी।

महज 14 साल की उम्र में उन्होंने देखा कि कैसे छोटी-मोटी लूट के लिए लोगों की हत्या कर दी जाती थी।उन्होंने भारत में ही शादी की, आज उनका एक बेटा और बेटी हैं और जिंदगी सुकून भरी है।   
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