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पप्पू यादव और निशिकांत दुबे के बीच जुबानी जंग: अदाणी की देवघर यात्रा से BJP जॉइनिंग की अफवाहों तक वार-पलटवार

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देवघर में बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के बाद उद्योगपति गौतम अदाणी की सांसद निशिकांत दुबे से शिष्टाचार भेंट। (तस्वीर: जागरण)



डिजिटल डेस्क, रांची। बिहार के पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव (राजेश रंजन) और झारखंड के गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के बीच एक्स (ट्विटर) पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है।

पप्पू यादव ने दुबे पर उद्योगपतियों के एजेंट होने और नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने का आरोप लगाया है। वहीं, दुबे ने पलटवार करते हुए दावा किया कि पप्पू यादव हाल ही में भाजपा में शामिल होने की कोशिश कर रहे थे।

यह विवाद पप्पू यादव की राजनीतिक यात्रा और भाजपा से जुड़ी पुरानी अफवाहों को फिर से चर्चा में ला रहा है। आइए जानते हैं विवाद की पृष्ठभूमि और दोनों नेताओं के बयानों को।
विवाद की शुरुआत एक्स पर पोस्ट और जवाब

विवाद की शुरुआत 22 फरवरी 2026 को पप्पू यादव के एक एक्स पोस्ट से हुई, जिसमें उन्होंने उद्योगपति गौतम अदाणी की देवघर यात्रा का जिक्र किया।

पप्पू यादव ने लिखा: “देवघर में आज अदाणी मंदिर आए थे, फिर वह उद्योगपतियों के एक एजेंट MP के यहां गए!

उद्योगपतियों की दलाली और नेहरू गांधी के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाना उस सांसद का मुख्य धंधा है, इस भेंट से साफ है गांधी जी, नेहरू जी, राहुल जी, इंदिरा जी आदि के विरुद्ध दुष्प्रचार का निवेशक कौन है!“

इसका जवाब देते हुए निशिकांत दुबे ने उसी दिन पोस्ट किया: “अभी संसद सत्र के दौरान मुझसे यही सज्जन लोकसभा के अंदर मुझसे मिलने आए थे, एक ही इनकी विनती थी कि मुझे भाजपा में शामिल करवा दीजिए।

अंगूर खट्टे हैं, कुछ तो दिन ईमान होना चाहिए? आपके चुनाव क्षेत्र में हमारे परिवार की कितनी जमींदारी है, यह भी लोगों को बताइए, कांग्रेस पार्टी से मेरा भाई पूर्णिया से विधायक रहे, यह भी बताइए। राजनीति की मर्यादा रखिए।“

इस एक्सचेंज पर दोनों सांसदों के फालोवर्स की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आईं, जिसमें कुछ ने दुबे के दावे का समर्थन किया तो कुछ ने पप्पू यादव की राजनीतिक स्वतंत्रता पर जोर दिया।
पप्पू यादव और भाजपा से जुड़ी अफवाहें

पप्पू यादव की राजनीतिक यात्रा 1990 के दशक से शुरू हुई। वे कई पार्टियों से जुड़े रहे, जिसमें राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) शामिल है।

2015 में आरजेडी से निष्कासन के बाद भाजपा में शामिल होने की अफवाहें चली थीं। उस समय मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि पप्पू यादव भाजपा से संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन भाजपा ने स्पष्ट किया कि कोई गठबंधन नहीं होगा।  

मार्च 2024 में पप्पू यादव ने अपनी जन अधिकार पार्टी को कांग्रेस में विलय कर दिया।

हालांकि, 2024 लोकसभा चुनाव में आरजेडी के साथ सीट बंटवारे के कारण उन्हें कांग्रेस टिकट नहीं मिला और वे पूर्णिया से निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते।

हाल के महीनों में पप्पू यादव ने भाजपा की आलोचना की है। अक्टूबर 2025 में उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव के सीट बंटवारे पर भाजपा को नीतीश कुमार को कमजोर करने का आरोप लगाया।

जनवरी 2026 में एक पोस्ट में उन्होंने भाजपा को “बहुत जलील पार्टी“ कहा और महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाए। साथ ही, उन्होंने भाजपा-आरएसएस पर दलितों से नफरत का आरोप लगाया।

उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को महागठबंधन में शामिल होने का न्योता भी दिया, दावा करते हुए कि भाजपा उन्हें राजनीतिक रूप से खत्म कर रही है।

हालांकि, कुछ मौकों पर वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करते नजर आए हैं, जिससे राजनीतिक अटकलें बढ़ीं।
निशिकांत ने पढ़ाया राजनीतिक मर्यादा का पाठ

निशिकांत दुबे ने पप्पू यादव के आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक ईर्ष्या बताया। दुबे संसद में अक्सर विपक्ष पर हमलावर रहते हैं और नेहरू-गांधी परिवार पर आरोप लगाते रहे हैं।

इस विवाद में उन्होंने पप्पू यादव से राजनीति में मर्यादा बनाए रखने की अपील की और पूर्णिया में अपने परिवार की जमीनदारी तथा भाई के कांग्रेस से विधायक रहने का जिक्र किया।
दोनों पक्षों की स्थिति पर विशेषज्ञ

पप्पू यादव ने दुबे के भाजपा जॉइनिंग वाले दावे पर अभी तक सीधा जवाब नहीं दिया है। उनके समर्थक इसे राजनीतिक साजिश बता रहे हैं।

वहीं, दुबे के बयान पर भाजपा के कुछ कार्यकर्ताओं ने समर्थन जताया है। राजनीतिक विश्लेषक ओमप्रकाश अश्क का मानना है कि यह विवाद बिहार की राजनीति से जुड़ा है, जहां 2025 विधानसभा चुनाव के बाद एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर तनाव रहा।

पप्पू यादव खुद को कांग्रेस कार्यकर्ता बताते हैं और राहुल गांधी की दृष्टि पर महागठबंधन की जीत की बात करते हैं।

एक तरफ पप्पू यादव नेहरू-गांधी परिवार की रक्षा में सक्रिय दिखते हैं, वहीं उनकी भाजपा आलोचना और पुरानी अफवाहें उनकी राजनीतिक स्थिति को जटिल बनाती हैं।

विवाद के बीच दोनों सांसदों से संसदीय संवाद की उम्मीद की जा रही है।
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