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इलाहाबाद विश्वविद्यालय का क्रिकेट मैदान, वर्ष 1977 में सांसें रोके देने वाले मैचों का प्रत्यक्षदर्शी रहा है

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के क्रिकेट मैदान में प्रैक्टिस करते खिलाड़ी। जागरण



जागरण संवाददाता, प्रयागराज। दिसंबर 1977... नार्थ जोन यूनिवर्सिटी का सेमीफाइनल खेला जा रहा था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की टीम मात्र 92 रन पर आलआउट हो गई। 10 हजार से अधिक दर्शकों से खचाखच भरे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के मैदान पर पहले जमकर हूटिंग हुई फिर सन्नाटा पसर गया। क्योंकि फाइनल में पहुंचने की सारी संभावनाएं खत्म हो गई।

पंजाब में उस समय भारतीय क्रिकेटर राजेंद्र सिंह घई जैसे दिग्गज क्रिकेटर मौजूद थे। हालांकि असली रोमांच अभी बाकी था। मैच शुरू हुआ और मैदान पर वह घटित हुआ, जिसने इतिहास बना दिया। 91 रन पर ही पंजाब टीम आलआउट हो गई। पूरे मैदान पर जोश और शोर से उत्साह चरम पर पहुंच गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की टीम फाइनल में पहुंच गई.....।

यह यादें है-इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व क्रिकेट कोच देवेश मिश्रा की। जो शनिवार को विश्वविद्यालय के मैदान पर पुन: क्रिकेट शुरू होने पर उसके प्रत्यक्षदर्शी बनने के लिए बतौर अतिथि पहुंचे थे। दैनिक जागरण से उन्होंने पुराने दिनों की यादें साझा की। बताया कि फाइनल के दिन वह अपने पड़ोसी और दिग्गज गेंदबाज एचएन दारा (जो बाद में पाकिस्तान चले गए) के साथ मैच देखने आए थे। दारा, दारागंज में रहते थे, बल्लेबाजी का बहुत शौक था तो वह गली में उन्हें प्रैक्टिस कराते थे।

फाइनल मुकाबला दिल्ली यूनिवर्सिटी से था। उस टीम में कीर्ति आजाद, रमन लांबा जैसे दिग्गज शामिल थे। देवेश मिश्र बताते हैं कि उस मैच में एक भारी चूक भारी पड़ गई। मैच के दौरान रफीक अहमद ने कीर्ति आजाद का कैच क्या छोड़ा, मानो मैच ही दूट गया। एक ओर जमकर हूटिंग हुई और दूसरी ओर कीर्ति आजाद ने ताबड़तोड़ शतक जड़कर दिल्ली यूनिवर्सिटी का स्कोर 400 पहुंचा दिया। यह तीन दिन का मैच था, लेकिन इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की टीम दूसरे दिन 150 रन पर ही आलआउट हो गई और उसे उपविजेता से संतोष करना पड़ा। इसके बाद कभी भी एयू की टीम किसी फाइनल में नहीं पहुंची और न ही दोबारा कभी यहां नार्थ जोन का मैच हो सका।

देवेश मिश्रा बताते हैं कि उस समय इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की कप्तानी सलीम अहमद कर रहे थे। जबकि टीम में प्रदीप दुबे, एचएन दारा, ओम प्रकाश श्रीवास्तव, लियाकत अली, सराफत हुसैन, राजेश श्रीवास्तव, मधूप शुक्ला, रफीक अहमद, रफात उल्ला जैसे जबरदस्त खिलाड़ी शामिल थे।

प्रोफेसर करते थे कमेंट्री

वर्ष 1977 में जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में नार्थ जोन का मैच हुआ था इसमें अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर और एयू क्रिकेट के सचिव स्कंद गुप्त ने कमेंट्री की। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर भी क्रिकेट मैचों में कमेंट्री की। वहीं, इकोनामिक्स के प्रोफेसर व प्रसिद्ध गायिका शुभा मुद्गल के पिता अमरेंद्र सिंह और मनीष देब भी हिंदी में कमेंट्री किया करते थे। स्कंद गुप्ता अपनी लंब्रेटा स्कूटर से चला करते थे और बरगद के पेड़ के नीचे ही उनकी स्कूटर खड़ी होती थी।

धोनी फाउंडेशन ने कराया था टूर्नामेंट

वर्ष 2013-14 में जब धोनी फाउंडेशन ने यहां क्रिकेट को पुन: शुरू करने का जिम्मा लिया। टूर्नामेंट हुआ, उस वर्ष प्रथम मिश्रा उदयीमान खिलाड़ी के रूप में चुने गए और उन्हें दिल्ली में बुलाकर 35 हजार रुपये की स्कालरशिप दी गई थी। इसके बाद छोटे स्तर पर टेक्नोकप के माध्यम से विश्वविद्यालय में क्रिकेट को जीवंत रखने का प्रयास चलता रहा, जो देवेश मिश्रा के सेवानिवृत्त होने के साथ बंद हो गया।

अच्छे को और अच्छा बनाना होगा

मो. कैफ समेत चार दर्जन से जयादा दिग्गज खिलाड़ी देने वाले कोच देवेश मिश्र ने कहा कि भारतीय क्रिकेट टीम में लंबे समय से कोई प्रयागराज का खिलाड़ी शामिल नहीं हुआ है, हमें इसके मूल में जाना होगा। दर्जनों बच्चे खेल रहे हैं, लेकिन अच्छे को और अच्छा बनाना होगा। चुनना होगा खिलाड़ियों को, सबको पांच-पांच मिनट का समय देकर वहां नहीं पहुंचाया जा सकता। जो जिम्मेदार हैं, कोच हैं, उन्हें ध्यान देना होगा। जो पहले से अच्छे हैं उन्हें और अच्छा बनाएं, तभी भारतीय टीम की यात्रा तय होगी।

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