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धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, जबलपुर। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने धार स्थिति बहुचर्चित भोजशाला विवाद से जुड़ा मामला वापस इंदौर बेंच भेज दिया है। कोर्ट ने साफ किया चूंकि भोजशाला स्ट्रक्चर धार जिले में है और वह इंदौर बेंच के क्षेत्राधिकार में आता है, इसलिए मामला वहीं भेजा जाए।
कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि मामले से जुड़े सभी रिकार्ड इंदौर बेंच भेजे जाएं। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि एएसआई की सीलबंद लिफाफे में बंद रिपोर्ट की प्रति सभी पक्षों को देने के सबंध में भी इंदौर बेंच ही निर्णय लेगी। मामले की अगली सुनवाई 23 फरवरी को इंदौर बेंच में होगी।
हालांकि राज्य की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह सहित अन्य वकीलों ने मामला मुख्यपीठ जबलपुर में ही सुने जाने का निवेदन किया था। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने साफ किया कि क्षेत्राधिकार की दृष्टि से यह मामला इंदौर बेंच में ही सुनवाई योग्य है।
इंदौर बेंच ने भेजा था मुख्यपीठ
दरअसल, हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस व अन्य की ओर से दायर कुल चार याचिकाओं पर 16 फरवरी को हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला व न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ में सुनवाई थी। इस विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा 22 जनवरी को दिए गए आदेश पर गौर करने के बाद न्यायमूर्ति शुक्ला की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले को मुख्यपीठ जबलपुर में ट्रांसफर करने कहा, ताकि प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश उचित आदेश पारित कर सकें। इसके बाद भोजशाला विवाद से जुड़े सभी पांच मामले मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली युगलपीठ के समक्ष बुधवार को सूचीबद्ध किए गए थे।
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यह है मामला
पूजा के अधिकार बनाम नमाज की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में यह मामला हिन्दू फ्रंट फार जस्टिस व अन्य की ओर से दाखिल किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि 1010 से 1055 ईस्वी के बीच राजा भोज द्वारा निर्मित भोजशाला नाम के इस स्थल में देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर था और यह संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। यहां वेद, शास्त्र, ज्योतिष और खगोल जैसे विषयों की शिक्षा दी जाती थी।
याचिका में कहा गया है कि यह स्थान सनातन परंपराओं का संरक्षण करने वाला आदर्श गुरुकुल था। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बाद के मुस्लिम शासकों ने भोजशाला परिसर को क्षति पहुंचाई, लेकिन इसकी धार्मिक पहचान नहीं बदल सकी और हिंदू श्रद्धालु लगातार पूजा करते रहे। वहीं ब्रिटिश काल में इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में प्रचारित करने की कोशिश की गई, जिसे याचिका में तथ्यों के विपरीत बताया गया है। |
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