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\“सेफ सिटी प्रोजेक्ट\“ के पहले चरण को सोमवार को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने शुभारंभ कर दिया।
राकेश कुमार सिंह, नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली अब केवल साधारण सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) की पैनी नजर में होगी। दिल्ली पुलिस की महत्वाकांक्षी \“सेफ सिटी प्रोजेक्ट\“ के पहले चरण को सोमवार को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने शुभारंभ कर दिया। इस प्रोजेक्ट के तहत दिल्ली के सभी 15 जिलों में 10,000 हाई-टेक एआइ इनेबल्ड कैमरे लगाए जा रहे हैं, जो शहर की सुरक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाएंगे।
857 करोड़ की लागत से निर्मित सेफ सिटी प्रोजेक्ट के पहले चरण का लोकार्पण हो जाने से अब पुलिस को काफी मदद मिलेगी। 10 हज़ार कैमरों से दिल्ली को जोड़ने के कार्यक्रम के प्रथम चरण में 2100 कैमरे लाइव जुड़ चुके हैं और पहले से मौजूद 15 हज़ार से अधिक कैमरों को भी इसके साथ जोड़ने का काम पूरा हो चुका है। यह आने वाले दिनों में दिल्ली की सुरक्षा को बहुत आगे ले जाएगा।
अत्याधुनिक कमांड रूम: सी फॉर आई का कमाल
इस पूरे सिस्टम के सुचारू संचालन के लिए जय सिंह रोड स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय के टावर नंबर एक की छठी मंजिल पर एक भव्य और अत्याधुनिक कमांड सेंटर बनाया गया है। इसे कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन, कंप्यूटिंग और इंटेलिजेंस नाम दिया गया है। यह कमांड रूम पूरे प्रोजेक्ट का \“मस्तिष्क\“ होगा। जैसे-जैसे कैमरे लगाए जा रहे हैं, उन्हें सीधे इस कमांड रूम से जोड़ा जा रहा है। इस सिस्टम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बिना किसी पीसीआर काल के ही पुलिस को सक्रिय कर देगा। यानी घटना होने के बाद सूचना मिलने का इंतजार करने के बजाय, सिस्टम खुद घटना को पहचान कर अलर्ट जारी करेगा।
एआई तकनीक: जो आवाज और हाव-भाव भी पहचानेगी
सेफ सिटी प्रोजेक्ट के तहत लगाए गए कैमरे साधारण रिकार्डिंग डिवाइस नहीं हैं। ये फेस रिकग्निशन सिस्टम और डिस्ट्रेस डिटेक्शन टेक्नोलाजी से भी लैस हैं।
आपातकालीन पहचान: यदि कोई व्यक्ति मुसीबत में है और चिल्लाता है या उसके चेहरे के हाव-भाव डर या तनाव दिखाते हैं, तो एआई तकनीक इसे तुरंत भांप लेगी।
संदिग्ध गतिविधियां: कोई लावारिस वस्तु या संदिग्ध गतिविधि कैमरे की जद में आते ही कमांड रूम में अलार्म बज जाएगा।
नागरिक सुविधाएं: यह सिस्टम इतना बारीक है कि यदि सड़क पर सीवर का ढक्कन भी खुला है, तो कंट्रोल रूम को इसकी जानकारी मिल जाएगी, ताकि दुर्घटना से बचा जा सके।
नौ साल का लंबा इंतजार और चुनौतियां
निर्भया कांड (2012) के बाद केंद्र सरकार ने देश के महानगरों को सुरक्षित बनाने के लिए \“निर्भया फंड\“ आवंटित किया था। मुंबई, हैदराबाद और लखनऊ जैसे शहरों ने राज्य और केंद्र के साझा सहयोग से इस प्रोजेक्ट को काफी पहले पूरा कर लिया। अब दिल्ली में भी पहले चरण का शुभारंभ हो गया। दिल्ली में इसके क्रियान्वयन में लंबा समय लगा। 2018 में आधिकारिक रूप से शुरू हुए इस प्रोजेक्ट की समय सीमा कई बार बढ़ाई गई। जी-20 शिखर सम्मेलन से पहले भी इसे पूरा करने का लक्ष्य था, लेकिन तकनीकी जटिलताओं के कारण ऐसा नहीं हो सका था।
डाटा एकीकरण और तकनीकी ढांचा
इस प्रोजेक्ट की सफलता के पीछे एक विशाल डेटा नेटवर्क है। इसमें 32 अलग-अलग डेटा सेट को एकीकृत किया जा रहा है, जिनमें नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो का डाटा, क्रिमिनल डोजियर और जिपनेट आदि शामिल हैं।
रेल टेल कंपनी इस सिस्टम को हाई-स्पीड इंटरनेट सेवा प्रदान कर रही है। इसके अतिरिक्त, प्रोजेक्ट के तहत दो मोबाइल कमांड और कंट्रोल गाड़ियां और 88 \“प्रखर\“ वैन तैनात की जाएंगी। ये वैन मोबाइल डेटा टर्मिनल, बाॅडी-वाॅर्न कैमरे और जीपीएस से लैस होंगी, जिससे पुलिस की प्रतिक्रिया समय में भारी कमी आएगी।
महिला सुरक्षा और मॉनिटरिंग
सुरक्षा को और अधिक संवेदनशील बनाने के लिए कमांड रूम में तकनीकी स्टाफ के साथ-साथ दिल्ली के सभी 15 जिलों से एक-एक महिला पुलिसकर्मी की 24 घंटे तैनाती रहेगी। ये महिला पुलिसकर्मी \“कॉल ट्रैकर\“ के रूप में कैमरों और अलर्ट मैसेज पर नजर रखेंगी। जैसे ही उनके संबंधित जिले में कोई संदिग्ध अलर्ट आएगा, वे तुरंत स्थानीय पीसीआर और थाने को सूचित करेंगी।
एक बार पूरी तरह सक्रिय होने के बाद, यह एआई-आधारित निगरानी तंत्र न केवल अपराधों को रोकने में मदद करेगा, बल्कि अपराधियों को पकड़ने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में दिल्ली पुलिस की क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा।
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