सांकेतिक तस्वीर (AI Image)
जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर। बायो-मेडिकल कचरे का यत्र-तत्र फेंका जाना न केवल पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इस विषय पर जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन की अध्यक्षता में समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसमें कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन और सुरक्षित निपटान पर विस्तार से चर्चा की गई।
बैठक में सिविल सर्जन को निर्देश दिया कि वे जिले के सभी सरकारी एवं निजी स्वास्थ्य संस्थानों का निरीक्षण कर 48 घंटे के भीतर सूची तैयार कर रिपोर्ट प्रस्तुत करें। संबंधित स्वास्थ्य केंद्र स्वयं बायो-मेडिकल कचरे का नियमानुसार निपटान सुनिश्चित करें, अन्यथा उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी।
जिलाधिकारी ने कहा कि अस्पतालों, क्लीनिकों, पैथोलाजी लैब, पशु चिकित्सा केंद्रों तथा टीकाकरण केंद्रों से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में बायो-मेडिकल कचरा निकलता है। इसका वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन आवश्यक है, अन्यथा यह संक्रमण और प्रदूषण का बड़ा कारण बन सकता है।
संक्रमित सुई, ब्लेड, ड्रेसिंग सामग्री, रक्त एवं शारीरिक द्रव से सने पदार्थ कई गंभीर रोगों के प्रसार का माध्यम बनते हैं। सुई चुभने की घटनाएं विशेष रूप से स्वास्थ्यकर्मियों और सफाई कर्मियों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करती हैं।
खुले में मेडिकल कचरा जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और जहरीली गैसें वातावरण में फैलती हैं। रासायनिक अपशिष्ट मिट्टी और भू-जल को प्रदूषित करते हैं, जिससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय क्षति होती है।
प्लास्टिक आधारित मेडिकल कचरा लंबे समय तक पर्यावरण में बना रहता है और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। बैठक में नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा निजी एवं सरकारी अस्पतालों के प्रतिनिधियों सहित अन्य संबंधित हितधारकों ने भाग लिया। |