सीजेएम दून कोर्ट का आदेश व दुष्कर्म की धारा में प्राथमिकी को हाई कोर्ट ने किया रद। फाइल फोटो
जागरण संवाददाता, नैनीताल। हाई कोर्ट ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म के एक मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट देहरादून का पांच अक्टूबर 2023 का आदेश व पुलिस स्टेशन मसूरी में दर्ज प्राथमिकी को रद करते हुए कहा कि रिश्ते का लंबा समय, बार-बार बातचीत और अपनी मर्जी से लगातार साथ रहना, शुरुआती धोखाधड़ी के इरादे के अंदाज के विरुद्ध है।
आरोपित युवक की ओर से सीजेएम कोर्ट में दायर आरोप पत्र तथा अपने विरुद्ध दर्ज मुकदमे को रद करने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने कहा कि यदि आरोपों को अगर उनकी असलियत के हिसाब से देखें, तो ज्यादा से ज्यादा एक ऐसे रिश्ते की ओर इशारा करते हैं, जो बाद में फेल हो गया, जिसे धारा 376 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।मसूरी निवासी युवती ने 2023 में मसूरी थाना में प्राथमिकी दर्ज कहा था कि दोनों एक-दूसरे को जानते रहे हैं।
शादी का झांसा देकर युवक ने लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाए। न्यायाधीश न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने इस मामले में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि पूरा मामला केवल इस आरोप पर आधारित है कि आधारित है कि आरोपित युवक ने शादी का भरोसा दिलाया था और बाद में युवती से शादी करने से मना कर दिया। आरोपित युवक के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि सिर्फ शादी का वादा तोड़ना दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता, जब तक यह न दिखाया जाए कि वादा शुरू से ही झूठा था और सिर्फ शारीरिक संबंध के लिए सहमति लेने के लिए किया गया था।
सरकारी अधिवक्ता ने दलील दी कि शादी का वादा शुरू से झूठा था या यह बाद में वादा तोड़ने का मामला था, यह पूरी तरह से तथ्यों का सवाल है, जिस पर सबूतों के आधार पर ट्रायल के दौरान ही निर्णय हो सकता है। चूंकि चार्जशीट में ट्रायल वाले मुद्दे बताए गए हैं, इसलिए याचिका खारिज की जानी चाहिए।
रिकॉर्ड देखने के बाद एकलपीठ ने कहा कि प्राथमिकी में युवक-युवती के बीच लगातार बातचीत, अपनी मर्ज़ी से साथ और बार-बार सहमति से शारीरिक संबंध बनने की बात मानी गई है। कोर्ट ने अभियोजन के आरोप पर पाया कि ऐसे रिश्ते शादी के भरोसे पर बनाए गए थे, जिसे बाद में पूरा नहीं किया गया।
मौजूदा मामले में ना तो एफआइआर और न ही आरोप पत्र में कोई खास हालात, व्यवहार या उस समय की कोई ऐसी बात बताई गई है, जिससे लगे कि युवक का रिश्ते की शुरुआत से ही शिकायत करने वाले से शादी करने का कोई इरादा नहीं था। कोर्ट ने कहा कि जहां बिना किसी विवाद के आरोप और अपराध के जरूरी तत्वों का खुलासा नहीं करते, वहां आपराधिक कार्रवाई जारी रखना कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होगा। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने सीजेएम कोर्ट का आदेश तथा मुकदमे की पूरी कार्रवाई को रद करने का आदेश पारित किया।
शुरू से ही झूठा था वादा
कोर्ट ने कहा कि युवक-युवती दोनों बालिक थे। लंबे समय से रिलेशनशिप में थे। दोनों के बीच लगातार बातचीत और मर्जी से संबंध बनाने की बात कही गई है। अभियोजन का मामला पूरी तरह इस आरोप पर आधारित है कि संबंध शादी के भरोसे से बनाए गए थे, बाद में युवक ने शादी से इन्कार कर दिया।
शादी के वादे के आधार पर धारा-376 के तहत अपराध के लिए पहली नजर में दिखाना होगा कि वादा शुरू से ही झूठा था और केवल सहमति लेने के लिए किया गया था। केवल वादा तोड़ना चाहे नैतिक रूप से कितना ही गलत क्यों ना हो, शुरू में धोखे का सबूत नहीं होने पर अपने आप में दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।
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