ज्योतिर्विद् आचार्य निरंजनानंद जी महाराज।
दिलीप कुमार शुक्ला, भागलपुर। महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित माना जाता है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाए जाने वाले इस पर्व पर श्रद्धालु दिनभर व्रत रखकर रात्रि जागरण करते हैं और शिवलिंग पर बेलपत्र, दूध, दही, घी व जल अर्पित कर पूजा-अर्चना करते हैं।
आध्यात्मिक मान्यता
महाशिवरात्रि का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक भी है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया और सृष्टि के कल्याण का मार्ग प्रशस्त हुआ। देशभर के मंदिरों में विशेष पूजा, रुद्राभिषेक, भजन-कीर्तन और रात्रि जागरण का आयोजन किया जाता है।
वर्ष में 12 शिवरात्रि होती है
ज्योतिर्विद् आचार्य निरंजनानंद जी महाराज ने बताया कि प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि मनाई जाती है, इस प्रकार वर्ष में 12 शिवरात्रि होती हैं। हालांकि फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को पड़ने वाली महाशिवरात्रि को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इसे निराकार ओंकार से साकार रूप में प्रकट होने की ‘महारात्रि’ कहा जाता है।
समस्त चराचर जगत के स्वामी हैं शिव
आचार्य निरंजनानंद जी महाराज के अनुसार, “एकोऽहम् बहुस्याम” की भावना इसी तिथि से जुड़ी है, अर्थात पहले केवल शिव थे और बाद में वही समस्त चराचर जगत में व्याप्त हुए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवघर स्थित रावणेश्वर बैद्यनाथ धाम की स्थापना भी इसी तिथि को हुई थी। साथ ही भगवान शिव और माता पार्वती (महाराज पर्वत की पुत्री) का विवाह भी फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही संपन्न हुआ था।
भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह
आचार्य निरंजनानंद जी महाराज ने आगे बताया कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को श्रद्धालु भगवान शंकर और माता पार्वती की वैवाहिक वर्षगांठ के रूप में प्रत्येक वर्ष उनके विवाह का आयोजन करते हैं। विद्वान पंडितों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यह पूरी प्रक्रिया संपन्न कराई जाती है। शिव और पार्वती मंदिरों में विशेष अनुष्ठान आयोजित होते हैं। दोनों का विधिवत शृंगार किया जाता है और विधि-विधान से पूजा-अर्चना होती है। कई स्थानों पर भगवान शिव की प्रतीकात्मक वरयात्रा भी निकाली जाती है। इस दौरान विभिन्न स्वरूपों में देवी-देवताओं तथा शिवगणों की उपस्थिति का भी वर्णन किया जाता है।इन्हीं कारणों से महाशिवरात्रि का दिन विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन आत्मशुद्धि, संयम और समर्पण के साथ भगवान शिव का स्मरण करते हैं।
कौन हैं आचार्य निरंजनानंद जी जान लीजिए
ज्योतिर्विद् आचार्य निरंजनानंद जी महाराज ने गुरुधाम श्री श्यामाचरण वेद प्रतिष्ठान से वेद, व्याकरण, कर्मकांड, ज्योतिष और हस्तरेखा का अध्ययन किया है। वे भागवत कथा भी सुनाते हैं। वर्तमान में उनका पैतृक निवास बांका जिले के पवई गांव में है, जहां वे रहते हैं। साथ ही, वे उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय, कोलबुजुर्ग, अमरपुर में संस्कृत के अध्यापक पद पर कार्यरत हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़े हैं। अभी उनपर बांका जिला अंतर्गत अमरपुर खंड के कार्यवाह का दायित्व है। |