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सब कुछ होकर भी क्यों नहीं है शांति? जानें जीवन का खोया हुआ उद्देश्य

Chikheang 3 hour(s) ago views 713
  

Brahmakumari Shivani Thoughts: जीवन का उद्देश्य।



ब्रह्माकुमारी शिवानी (प्रेरक वक्ता)। जीवन में प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई प्रयोजन या उद्देश्य होता है। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उस वस्तु को बनाया गया है या उसका उपयोग होता है। यदि वह वस्तु उस उद्देश्य में सफल नहीं होती है, यानी उपयोग करने वालों को सुख-सुविधा नहीं देती है तो उपभोक्ता के लिए वह वस्तु बेकार हो जाती है। अर्थात, वस्तुओं की सार्थकता या उनकी उपयोगिता सुख-सुविधा दे पाने में ही है। देखा जाए तो प्रकृति की कोई भी वस्तु खुद के लिए या खुद को सुख देने के लिए नहीं, बल्कि अन्य की सेवा करने वा अन्य को सुख देने के लिए बनी है।

जैसे कि सूर्य का प्रकाश, जल, वायु, वृक्ष, लता या कोई वस्तु जैसे बिजली, कुर्सी, पंखा, भोजन आदि अगर हमें आराम व सुख नहीं देते हैं तो हमारे लिए उस समय उनका महत्व या उपयोगिता समाप्त हो जाती है।
मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य

इसी तरह हम मानव भी मूलत: स्वाभाविक रूप में अन्य लोगों को सुख शांति देने व बांटने की प्रवृत्ति वाले ही होते हैं, पर कालक्रम में चलते हम अपने मूल उद्देश्य को भूल जाते हैं और लेने वाले बन जाते हैं। वर्तमान समय में देखें तो एक हम ही हैं, जो अधकांश स्वयं के लिए जी रहे हैं। जब हम देने के स्वभाव से परिवर्तित होकर लेने की मानसिकता के अधीन होते हैं, तो हम अंदर से स्वयं को रिक्त महसूस करते हैं। न स्वयं को और न ही दूसरों को कुछ अच्छा दे पाते हैं।

ऐसी अवस्था में हम स्वयं भी सुकून से नहीं रह पाते हैं, क्योंकि मनुष्य जीवन का जो मूल उद्देश्य है या होना चाहिए, वह हम जी नहीं पाते हैं। कहीं न कहीं, किसी न किसी की गलत सलाह पर चलकर हम अपने सही मार्ग या उद्देश्य से भटक जाते हैं और देने वाले के बजाय लेने वाले बन जाते हैं।
हमारी प्राचीन दैवी संस्कृति

हमारी प्राचीन दैवी संस्कृति, जीवन मूल्य एवं आध्यात्मिक जीवन दर्शन से शिक्षा लेकर हम मानव जीवन के श्रेष्ठ उद्देश्य को अपने में पुनर्जीवित व पुनः विकसित कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो कुछ घरों में एक कुलदेवता या कुलदेवी की पूजा की जाती है। यह प्रथा दर्शाती है कि हम किस देवी-देवता कुल, परिवार या वंशावली के हैं और उस वंश, परिवार व समुदाय का क्या ऊंचा लक्ष्य और लक्षण होना चाहिए! कुल देवी वा देवताओं की महिमा सिर्फ पूजा के लिए या पूजा के समय याद नहीं आना चाहिए, बल्कि सदा याद रहना चाहिए कि हम परम दाता परमात्मा के बच्चे और देवी-देवताओं के वंश के हैं। दूसरों को देने के स्वभाव वाले संस्कार के हैं, तो देवी-देवताओं की भांति हमें जहां तक हो सके औरों को सुख-शांति-सहयोग देने की वृत्ति, व्यवहार व आचरण को अपनाना चाहिए।

लेकिन, देने की प्रवृत्ति वाले लोग इस समय ज्यादातर लेने वाले बन गए हैं। कोई-कोई तो दूसरों से छीनकर भी लेने लग गए हैं। तभी बिना उद्देश्य के साथ जीने वाले लोग सही मायने में न तो खुद की और न ही अन्य की सही मायने में सेवा कर पाते हैं। अकसर ऐसे लोग दुखी व परेशान रहते हैं।
सुख-शांति व चैन का अनुभव

पर हम सभी को देवी-देवताओं की मूर्तियों के दर्शन मात्र से ही सुख-शांति व चैन का अनुभव होता है और लगता है हमारी सभी मनोकामनाएं पूरी हो गई है। कुछ क्षणों के केवल दर्शन से ही हम और हमारी दुनिया को प्रसन्नता की अनुभूति होती है, लेकिन अपने जीवन का उद्देश्य भूलने से हम अपनों के साथ बैठे हुए भी कहते हैं कि सब कुछ है, पर शांति नहीं है। देवी-देवताओं के चित्र अगर दूसरों को शांति दे सकते हैं तो उसकी तुलना में हम तो चैतन्य मनुष्य है, लेकिन हम दूसरों को शांति नहीं दे पाते हैं। सिर्फ स्वयं को व अपने उद्देश्य को भूलने के कारण। असल में, मेरा उद्देश्य दूसरों से चाहने में नहीं, अपितु दूसरों को देने में समाया हुआ है।
मुखौटा तो उतारो

जिस देने की दृष्टिकोण, वृत्ति व भावना को जीवन में अपनाने से हमारे चाल, चलन, चेहरा व चरित्र देवी-देवताओं की भांति सुखदायी बन जाते हैं। अपने इस सुख देने वाले मूल स्वरूप, स्वभाव व उद्देश्य को भूलने के कारण आज हम दूसरों से कुछ पाने की अपेक्षा रखते हैं, वह भी देह अभिमान रूपी मुखौटा धारण कर। जब हम कोई मुखौटा लगाए घूमते हैं, तो लोग कहते हैं मुखौटा तो उतारो, ताकि आपका असली चेहरा नजर आए! आज हमारे मूल व्यक्तित्व के ऊपर एक कृत्रिम आवरण आ चुका है, जिसके कारण पवित्रता, शांति, खुशी व प्रेम आदि हमारे मूल स्वभाव न स्वयं को, न ही अन्य को दिखाई पड़ते हैं।
जीवन उद्देश्य का सही अर्थ

स्वयं को व अपने जीवन उद्देश्य को सही अर्थ में जानने वा अपनाने के लिए हमें देह अभिमान व अहंकार को समझना और दूर करना होगा। वास्तव में यह अहंकार एक कृत्रिम व अस्थाई मुखौटे के समान है, जिसको हमें उतारना पड़ेगा। उसकी जगह हमें अपने अंतरात्मा एवं उसमें निहित सद्गुणों को जगाना व विकसित करना होगा। देह अभिमान के कारण हम मैं-मेरा, क्यों-क्या, कब तक ऐसे चलेगा आदि प्रश्नों के द्वंद्व, दुख, अशांति व तनाव से घिरे हैं, उन्हें जड़ से समाप्त करना होगा। अज्ञानता के कारण मनुष्यों में देह अभिमान व अहंकार उत्पन्न होता है, जिससे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, घृणा, हिंसा आदि अन्य सभी मनोविकार एवं अवगुण पैदा होते हैं और पनपते हैं।
मूल गुण व स्वरूप

जबकि हमारे अंतरात्मा की निजी व मूल गुण व स्वरूप दिव्यता, आत्मिक प्रेम, पवित्रता, सुख शांति व प्रसन्नता है, जिसे हमें आध्यात्मिक ज्ञान व परमात्म योग के नियमित अभ्यास से जगाना है। जब हम परमात्मा की याद तथा अंतरात्मा के सुख शांति, स्नेह व पवित्र स्वरूप की स्मृति में रहकर सांसारिक कार्य निर्वहन करेंगे तो न केवल हम प्रसन्नता से कर्तव्य संपादन करेंगे, अपितु सदा प्रसन्न रहेंगे, प्रसन्नता देंगे और लेंगे।

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