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राज्य ब्यूरो, लखनऊ। देश की विधान सभाओं व विधान परिषद के कामकाज को अधिक दक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (एनएलआइ) तैयार करने पर सहमति बन गई है।
इस सूचकांक के माध्यम से विधान सभाओं और विधान परिषदों की प्रदर्शन के आधार पर रैंकिंग की जाएगी। 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में इस पर सहमति बन गई है। लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जल्द ही इसके लिए एक कार्यकारी समिति गठित करने का निर्णय लिया है।
तीन दिवसीय अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन की मेजबानी इस बार उत्तर प्रदेश विधान सभा कर रही है।
मंगलवार को सम्मेलन के दूसरे दिन दिल्ली विधान सभा के अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने राष्ट्रीय विधायी सूचकांक के बारे में कहा कि इससे विधायिकाएं जनता के प्रति अधिक उत्तरदायी बनेंगी, नवाचार को बढ़ावा मिलेगा और राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा विकसित होगी। इससे देशभर में विधायी प्रक्रियाओं में सुधार आएगा और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर नागरिकों का विश्वास मजबूत होगा।
उन्होंने कहा कि विधायिका की जवाबदेही और पारदर्शिता समय की मांग है। सूचकांक न केवल उपलब्धियों को सामने लाएगा, बल्कि उन क्षेत्रों की भी पहचान करेगा जहां सुधार की जरूरत है। इससे बेस्ट प्रैक्टिस साझा होंगी और एकरूप मानक विकसित होंगे।
सम्मेलन में यह भी चर्चा हुई कि सदन के संचालन, प्रश्नकाल, विधायी कार्य, बजट पारित करने की समयसीमा, समितियों की सक्रियता और सदस्यों की भागीदारी जैसे मानकों को सूचकांक में शामिल किया जा सकता है।
वक्ताओं ने कहा कि जब सदन नियमित रूप से और प्रभावी ढंग से चलेगा, तभी सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित होगी। सूचकांक के लिए एक कार्यकारी समिति बनाकर इसे मूर्त रूप देने की मांग रखी गई। लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि पीठासीन अधिकारियों के इसी सम्मेलन में इस पर एक समिति बनाकर इस काम को आगे बढ़ाया जाएगा।
सूचकांक से यह होंगे फायदे
दक्षता में वृद्धि : सूचकांक के जरिए विधान सभाओं के कामकाज-सत्रों की संख्या, विधायी कार्य, समितियों की सक्रियता का नियमित आकलन होगा, जिससे कार्यक्षमता बढ़ेगी।
पारदर्शिता मजबूत होगी: विधायी प्रक्रियाओं, निर्णयों और प्रदर्शन से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक होंगे, जिससे जनता को सदन के कामकाज की स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी।
जवाबदेही तय होगी: रैंकिंग प्रणाली से विधायिकाओं की जनता के प्रति जवाबदेही बढ़ेगी और निर्वाचित प्रतिनिधियों पर प्रदर्शन सुधारने का दबाव बनेगा।
स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा: राज्यों के बीच बेहतर प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा शुरू होगी, जिससे सभी विधान सभाएं अपनी कार्यप्रणाली सुधारने का प्रयास करेंगी। पारदर्शिता से जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा मजबूत होगा।
बेस्ट प्रैक्टिस का प्रसार: अच्छा काम करने वाली विधान सभाओं की श्रेष्ठ प्रक्रियाएं (बेस्ट प्रैक्टिस) सबके सामने आएंगी, जिन्हें अन्य राज्य अपना सकेंगे।
नीतिगत सुधार में मदद: सूचकांक कमियों और चुनौतियों की पहचान करेगा, जिससे सुधारात्मक नीतियां बनाने में मदद मिलेगी।
मानकीकरण और एकरूपता: विधायी कार्यों के मूल्यांकन के लिए साझा मानक तय होंगे, जिससे देशभर की विधान सभाओं में एकरूपता आएगी।
नवाचार को प्रोत्साहन : तकनीक, डिजिटल टूल्स और नई कार्यप्रणालियों को अपनाने की प्रेरणा मिलेगी। |
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