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डॉ. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त: 1930-42 में RSS स्वयंसेवकों ने लिया सक्रिय भाग- प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा

Chikheang 2026-1-19 22:26:51 views 1257
  

आरएसएस के झारखंड के प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा। फोटो जागरण



संजय कुमार, रांची। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) के झारखंड के प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा ने कहा कि किसी भी संगठन के संस्थापक के चरित्र से ही उस संगठन की भूमिका समझ में आ जाती है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। 1921 के असहयोग आंदोलन एवं 1930 के नमक सत्याग्रह आंदोलन में स्वयं जेल गए थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हजारों स्वयंसेवक जेल गए। कई स्वयंसेवक बलिदान हुए, लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि संघ की स्वतंत्रता आंदोलन में कोई भूमिका नहीं थी।

गोपाल शर्मा सोमवार को दैनिक जागरण कार्यालय में जागरण विमर्श के तहत स्वतंत्रता आंदोलन में आरएसएस की भूमिका विषय पर अपनी बात रख रहे थे। प्रांत प्रचारक ने कहा कि आरएसएस के संस्थापक 11 वर्ष की उम्र में ही अपने विद्यालय में विक्टोरिया महारानी की राज्याभिषेक के 60 वर्ष पूरे होने पर बंट रही मिठाई को फेंक दिया था। 1907 में एक सुर्कलर निकालकर वंदेमातरम् बोलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, परंतु डाक्टर साहब ने कुछ बच्चों के साथ मिलकर वंदेमातरम गाने की योजना बनाई और सफल भी हुए।

1908 में दशहरे के दिन रावण दहन कार्यक्रम में उन्होंने जो भाषण दिया, जिस कारण से उन पर राजद्रोह का केस कर दिया गया। 1910 में वे मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए कोलकाता गए। वहां पर युगांतर और अनुशीलन समिति जैसे संगठनों के संपर्क में आए। प्रमुख क्रांतिकारी अरविंद घोष, वारींद्र घोष आदि के संपर्क में रहकर कार्य किया। 1927 में भगत सिंह ने भी नागपुर में आकर डॉ. हेडगेवार से भेंट की थी। प्रसिद्ध क्रांतिकारी राजगुरु नागपुर में संघ के स्वयंसेवक बने थे। 1928 में जब साइमन कमीशन का बहिष्कार किया गया तो नागपुर में हड़ताल और प्रदर्शन करने में संघ के स्वयंसेवक अग्रिम पंक्ति में थे। 1943 के चिमूर आंदोलन में 125 स्वयंसेवकों पर मुकदमा हुआ था। सैकड़ों स्वयंसेवक जेल गए थे।
1930 के आंदोलन में 10 हजार से अधिक स्वयंसेवक जेल गए थे

गोपाल शर्मा ने कहा कि 31 दिसंबर को 1929 को जब कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता की घोषणा की गई तब 26 जनवरी 1930 को संघ की सभी शाखाओं पर इसका वाचन किया गया था। 1930 के आंदोलन में तो 10 हजार से अधिक स्वयंसेवकों ने भाग लिया। 1932 में आरएसएस पर मध्य प्रांत में प्रतिबंध लगा दिया गया। देश में संघ पर यह पहला प्रतिबंध था। इस तरह डाक्टर साहब स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़ चढ़कर भाग लेते रहे।

उसी दौरान उन्हें लगा कि हमारा समाज आत्मविस्मृत, जाति, भाषा, प्रांत आदि गुटों में बंटा हुआ है। असंगठित है, अनेक कुरीतियों से भरा हुआ है। जिसका लाभ विदेशी उठाते रहे रहे हैं। आगे ऐसा न हो, इसके लिए ही उन्होंने 1925 में विजयादशमी के दिन आरएसएस की स्थापना कुछ लोगों को लेकर की। अभी आरएसएस का शताब्दी वर्ष चल रहा है। संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के बाद भी कुछ लोगों द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन में संघ की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वैसे लोगों को संघ के इतिहास को पढ़ने की जरूरत है। स्कूली पाठ्यक्रमों में भी बच्चों को सही जानकारी दी जाए, ऐसी आशा है।
कश्मीर और हैदराबाद रियासत के विलय में संघ की थी भूमिका

गोपाल शर्मा ने कहा कि देश विभाजन के समय लाखों हिंदुओं को संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी जान पर खेलकर बचाने का काम किया। विभाजन के बाद कश्मीर रियासत को भारत में मिलाने के लिए सरदार पटेल ने संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी से मदद मांगी। गुरुजी ने जाकर राजा हरि सिंह को तैयार कराया, उसके बाद कश्मीर का भारत में विलय हुआ। उसी तरह हैदराबाद को मिलाने में स्वयंसेवकों ने काफी सहयोग किया। जब पाकिस्तानी कबाइलियों ने कश्मीर के कई भागों पर कब्जा कर लिया था, उस समय स्वयंसेवकों ने हवाईपट्टी बनाने में काफी सहयोग किया।
स्वयंसेवकों ने की थी दिल्ली की रक्षा

स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित कई सवाल का जवाब देते हुए गोपाल शर्मा ने कहा कि स्वतंत्रता मिलने के बाद मुस्लिम लीग ने दिल्ली में हथियार और विस्फोटक जमा कर संसद पर कब्जा करने की योजना बना ली थी। उस समय संघ के चार स्वयंसेवक मुस्लिम बनकर मस्जिद में गए और उनकी योजना का पता लगाया। सरदार पटेल को सूचना दी। उसके बाद संसद पर कब्जा होने से बचाया गया। उन्होंने कहा कि जब सही इतिहास पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि संघ के स्वयंसेवकों ने महात्मा गांधी की दिल्ली में और 1946 में सिंध में जवाहर लाल नेहरू की सभा की रक्षा की थी। महात्मा गांधी, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, वीर सावरकर सहित कई राजनेता समय-समय पर डाक्टर साहब से मिलते रहे।
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