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साइबर ठगी पर नहीं लग पा रहा अंकुश, म्यूल खातों तक सिमटी जांच; मास्टरमाइंड अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर

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राकेश कुमार सिंह, नई दिल्ली। देश-विदेश से साइबर सिंडिकेट ने एनसीआर में रहने वाले लोग, खासतौर पर सेवानिवृत्त बुजुर्गों व अन्य का जीना मुहाल कर रखा है। हर दिन डिजिटल अरेस्ट व निवेश के नाम पर अलग-अलग साइबर सिंडिकेट दर्जनों लोगों को शिकार बना रहे हैं।जांच तो हो रही है लेकिन मुख्य सिंडिकेट बच जा रहे हैं।  
म्यूल खातों पर थम जा रही जांच

अलग-अलग कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारी बनकर साइबर अपराधी उन्हें अलग-अलग बहाने गिरफ्तारी का डर दिखाकर उनसे जीवन भर की कमाई ठग रहे हैं। शिकायत करने पर जिले की साइबर सेल थाना पुलिस, क्राइम ब्रांच का साइबर सेल अथवा आईएफएसओ यूनिट पीड़ितों की शिकायतों पर तुरंत एफआईआर दर्जकर जांच तो शुरू कर देती है, लेकिन म्यूल बैंक खातों से शुरू हुई पुलिस की जांच आगे जाकर वहीं रुक जाती हैं। पुलिस मुख्य साइबर अपराधियों तक नहीं पहुंच पाती है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल का कहना है कि साइबर ठगी की जितनी भी वारदातें हो रही हैं उनमें अधिकतर में पुलिस केवल म्यूल बैंक खाता धारकों अथवा साइबर सिंडिकेट को म्यूल खाता उपलब्ध कराने वालों को ही गिरफ्तार कर पाती हैं। देश-विदेश में छिपे मुख्य साइबर अपराधियों के खिलाफ साक्ष्य न मिल पाने व अन्य कारणों से पुलिस उन्हेें नहीं पकड़ पाती है। खाता धारकों काे पकड़कर पुलिस केस को वर्क आउट तो दिखा देती है लेकिन मुख्य साइबर अपराधियों के नहीं पकड़े जाने के कारण साइबर ठगी की वारदात पर अंकुश लग नहीं लग पा रहा है।
खाताधारकों को सरकारी गवाह बनाएं

एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी का कहना है कि केवल खाता धारकोें को गिरफ्तार करने के कारण साइबर अपराध पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। पुलिस को चाहिए कि वे खाता धारकों को सरकारी गवाह बनाएं। खाता धारक मुख्य साइबर अपराधियों के खिलाफ मजबूत सरकारी गवाह साबित हाे सकते हैं।

इससे देश-विदेश में छिपे मुख्य साइबर अपराधियों पर नकेल कसा जा सकेगा। पुलिस चाहे तो मुख्य साइबर अपराधियोें को बिना गिरफ्तार किए भी उनके खिलाफ अदालतों में ट्रायल चला सकती है। पिछले दिनों पुलिस ने कुछ मामलों में ऐसा किया भी है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि ऐसे अपराध जिनमें सात साल से कम सजा का प्रविधान है उनमें आरोपितों को गिरफ्तार नहीं किया जाए। लेकिन बढ़ते साइबर अपराध को देखते हुए केस को वर्क आउट के चक्कर में पुलिस को ऐसा करना पड़ रहा है।
तीन स्तर पर है कार्रवाई का प्रविधान

राजधानी में साइबर अपराध के मामले में तीन स्तर पर कार्रवाई की जाती है। 25 लाख से कम ठगी के मामले में जिले की साइबर सेल थाना पुलिस, 25 लाख से अधिक व 50 लाख तक क्राइम ब्रांच का साइबर सेल व 50 लाख से अधिक ठगी के मामले में स्पेशल सेल की इंटेलीजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटिक आपरेशन यूनिट जांच करती है।
2025 में रिकवरी दर बढ़ी

दिल्ली पुलिस के आंकड़ों को देखें ताे 2024 में साइबर अपराधियों ने दिल्ली वासियों से करीब 1100 करोड़ रुपये ठग लिए। 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 1250 करोड़ रुपये हो गया। 2024 में दिल्ली पुलिस ने जहां साइबर अपराधियों द्वारा ठगी गई रकम में केवल 10 प्रतिशत ही बरामद कर पाई थी, पुलिस का दावा है कि 2025 में रिकवरी दर बढ़कर करीब 24 प्रतिशत हो गई।
15 जिले में एक-एक साइबर थाना खोलना पड़ा

कोरोना के बाद तेजी से बढ़ते साइबर अपराध को देखते हुए 2022 में दिल्ली पुलिस को सभी 15 जिले में एक-एक साइबर थाने खोलना पड़ा फिर भी साइबर अपराध की घटनाओं पर पुलिस अंकुश नहीं लगा पा रही है। पिछले हफ्ते ग्रेटर कैलाश के एक बुजुर्ग दंपती को डिजिटल अरेस्ट कर उनसेे 14.85 करोड़ रुपये की ठगी ने राजधानी वासियों को हैरान कर दिया। इस घटना से दंपती अब तक सदमे में हैं।
देश के लोगों को शिकार बना रहे

कंबोडिया, वियतनाम और लाओस में बैठे साइबर अपराधी चीनी हैंडलर्स के इशारे पर लगातार देश के लोगों को शिकार बना रहे हैं। अब तक पुलिस इस दंपती की करीब तीन करोड़ ही बरामद कर पाई है। ज्यादातर साइबर अपराधी दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों कंबोडिया, लाओस और वियतनाम से काम करते हैं, जहां चीनी हैंडलर्स द्वारा चलाए जा रहे बड़े पैमाने पर स्कैम कंपाउंड दुनिया भर में लोगों को निशाना बना रहे हैं।
स्क्रीन पर दिखता है घरेलू काॅल जैसा

इन जगहों से अपराधी गैर-कानूनी सिम बाॅक्स इंस्टाॅलेशन का इस्तेमाल करते हैं जो टेलीकाम नेटवर्क को बायपास करके इंटरनेशनल काॅल को लोकल भारतीय नंबर के रूप में दिखाने की अनुमति देते हैं। काॅल असल में विदेश से रूट किए जाते हैं लेकिन गैर-कानूनी सिम बाक्स डिवाइस का इस्तेमाल करके उन्हें घरेलू काॅल जैसा दिखाई देता है, जिससे अपराधी पकड़े जाने से बच जाते हैं।
म्यूल बैंक अकाउंट एक बड़ी चुनौती

म्यूल बैंक अकाउंट एक बड़ी चुनौती बनी हुई है क्योंकि वे पैसे के कई लेयर वाले रास्ते बनाते हैं जिन्हें ट्रैक करना मुश्किल होता है। भारत में बैठे ठग अक्सर विदेशी सिंडिकेट्स को ठगी के फंड को विदेश भेजने के लिए म्यूल अकाउंट और सिमकार्ड देकर मदद करते हैं। ये अकाउंट आमतौर पर आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके के लोग खोलते हैं, जो कमीशन के बदले ठगों को सौंप देते हैं।

यह भी पढ़ें- तीन दिन तक डिजिटल अरेस्ट रख ग्रेटर कैलाश में बुजुर्ग महिला से 7 करोड़ ठगे, बच्चों से भी न करने दी बात; तुड़वाई एफडी
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