अतिक्रमण अवैध खनन ने अरावली में वायु गुणवत्ता पर डाला गंभीर प्रभाव (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अरावली क्षेत्र में अतिक्रमण, वनों की कटाई, अवैध खनन और शहरी बुनियादी ढांचे के विस्तार ने जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु संतुलन पर गंभीर असर डाला है।
एक अध्ययन में कहा गया है कि पिछली सदी के नौवें दशक से पहले विशेषकर सरिस्का और बरदोद वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास बड़े पैमाने पर वन भूमि में बदलाव के कारण प्राकृतिक वन आवरण में भारी गिरावट आई।
इससे महत्वपूर्ण वन्यजीव आवास और जल संग्रहण क्षेत्र कई हिस्सों में बंट गए। अरावली के पारिस्थितिक पुनस्र्थापन पर यह शोध सांकला फाउंडेशन द्वारा भारत में डेनमार्क दूतावास और हरियाणा वन विभाग के सहयोग से किया गया था।
इस अध्ययन में अरावली क्षेत्र में पारिस्थितिक गिरावट से निपटने के लिए एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया गया। इसमें पर्यावरण स्थिरता को जैव विविधता संरक्षण, जलवायु लचीलापन, आजीविका सुरक्षा और मानवाधिकारों से जोड़ा गया। अरावली पर्वतमाला विश्व स्तर पर सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है।
5 करोड़ से अधिक लोगों का है घर
यह भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और सिंधु-गंगा के मैदानों के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक अवरोध और जीवन-निर्वाह में मदद करने वाला पारिस्थितिक तंत्र है। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव द्वारा बुधवार को जारी की गई रिपोर्ट में कहा गया है-चार राज्यों और 29 जिलों में फैला यह नाजुक पारिस्थितिक तंत्र पांच करोड़ से अधिक लोगों का घर है।
वनों की कटाई, तेजी से शहरीकरण सहित अस्थायी भूमि उपयोग, व्यापक भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण के कारण यह क्षेत्र गंभीर खतरे में है। अध्ययन में कहा गया है कि अतिक्रमण, वनों की कटाई, अवैध खनन और शहरी बुनियादी ढांचे के विस्तार ने इस नाजुक पारिस्थितिक तंत्र में जैव विविधता, वायु गुणवत्ता और जलवायु नियमन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
इसने अरावली की हरित अवरोध के रूप में कार्य करने की क्षमता को कमजोर कर दिया है। इससे मरुस्थलीकरण में तेजी आई है और उत्तरी मैदानों की पारिस्थितिक स्थिरता को खतरा उत्पन्न हो गया है।
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