सुप्रीम कोर्ट।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि सरकारी नौकरी के लिए आवेदनों में उचित एवं पूर्ण जानकारी देना केवल एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह निष्पक्षता, ईमानदारी और जनविश्वास की एक बुनियादी जरूरत है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक खंडपीठ के मई 2025 के आदेश के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार कर लिया।
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने अपने एकल बेंच के आदेश की पुष्टि की थी, जिसमें सहायक समीक्षा अधिकारी के रूप में अपनी नियुक्ति रद किए जाने को चुनौती देने वाले व्यक्ति द्वारा दायर याचिका को स्वीकार कर लिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्राधिकरण ने उस व्यक्ति की नियुक्ति इस आधार पर रद की थी कि उसने दो आपराधिक कार्यवाहियों के लंबित होने की जानकारी छिपाई थी।
पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए कहा- \“\“यह कानून में सर्वमान्य रुख है कि सहानुभूति कानून का स्थान नहीं ले सकती। सरकारी नौकरी खोना एक ऐसा नुकसान है जिसे स्वीकार करना आसान नहीं है, फिर भी इसके परिणामों के प्रति जागरूकता कार्रवाई का एक आवश्यक घटक है।\“\“
पीठ ने यह भी कहा कि सरकारी पदों के लिए सैकड़ों और कभी-कभी हजारों आवेदक आवेदन करते हैं और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक उम्मीदवार की सावधानीपूर्वक जांच करना अनिवार्य है। जब कोई आवेदक आपराधिक पृष्ठभूमि छुपाता है तो वह चयन प्रक्रिया को कमजोर करता है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ) |
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