दिल्ली में स्माॅग कम करने के लिए पानी की छिड़काव। आर्काइव
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दिल्ली समेत एनसीआर के प्रदूषण को लेकर सरकारी एजेंसियां किस हद तक गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अध्ययन जिस समयावधि का होता है, उसकी रिपोर्ट सालों बाद जारी की जाती है।
इससे उसकी समसामयिकता भी बड़े स्तर पर प्रभावित होती है। ऐसे ही एक अध्ययन में सामने आया है कि 2010 से राजधानी में गंभीर स्माॅग तीन गुणा तक बढ़ा है। यह वृद्धि भूजल संरक्षण नीति 2009 लागू होने के बाद हुई है।
यह अध्ययन आईआईटीएम पुणे ने यूएस के नेशनल सेंटर फॉर एटमाॅस्फेरिक रिसर्च (एनसीएआर) और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के सहयोग से किया है। इसमें विज्ञानियों ने 2017 से 2021 के पराली जलाने के सीजन का विश्लेषण किया।
इसके अनुसार 2010 में पंजाब और हरियाणा में भूजल संरक्षण नीति 2009 लागू की गई थी। इसकी वजह से धान की फसल की बिजाई में देरी हुई। फसलों के तैयार होने और कटाई के बीच का समय कम हो गया। लिहाजा, जो पराली अक्टूबर में जल रही थी, वह नवंबर में जलना शुरू हो गई।
अध्ययन के अनुसार इस कारण वजह से दिल्ली के एक्यूआई स्तर में करीब 90 प्वाइंट का इजाफा हुआ और गंभीर स्माॅग की अवधि में 275 प्रतिशत का उछाल आया। पराली जलाने की अवधि में इस बदलाव के बाद गंभीर स्माग 89 घंटों से बढ़कर 334 घंटे तक पहुंच गया।
पराली जलाने के समय में इसी बदलाव की वजह से राजधानी में धुएं का असर अधिक पड़ने लगा। कारण, नवंबर में मौसम ठंडा होने की वजह से एटमास्फेरिक वेंटीलेशन कम रहता है। कम तापमान और कमजोर हवाओं में स्थिति और प्रतिकूल हो जाती हैं।
प्रदूषक सतह के आसपास ही बने रहते हैं। इस बदलाव की वजह से दिल्ली में पीएम 2.5 में भी व्यापक बदलाव हुआ। अध्ययन के अनुसार 2010 के मुकाबले पीएम 2.5 का स्तर करीब 36 प्रतिशत तक बढ़ा है। यह 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के करीब है।
अध्ययन बताता है कि उत्तर पश्चिमी हवाओं के साथ पराली का धुंआ गंगा के मैदानी इलाकों को भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। कुछ दिन पीएम 2.5 का स्तर राजधानी में 600 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक भी रहता है। इस दौरान राजधानी में कमजोर निचली हवाएं चलती हैं।
अध्ययन के दौरान एरोसोल करीब 40 प्रतिशत तक बढ़े। एरोसोल हवा में मौजूद वह छोटे कण होते हैं जिसमें धूल, धुंआ तथा अन्य प्रदूषक शामिल रहते हैं। यह सूर्य की रोशनी को धरती पर पहुंचने से रोकते हैं। ऐसा होने पर जमीन ठंडी हो जाती है, हवा उपर नहीं जा पाती और प्रदूषण नीचे ही बने रहते हैं।
यह सब जमीनी सतह के पास होता है। इसलिए प्रदूषण का सबसे गंभीर खतरा भी होता है। अध्ययन में कहा गया है कि इस नीतिगत बदलाव के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ गईं। 2021 अक्टूबर व नवंबर में 205 लोग अधिक बीमार हुए।
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