search

मोरों का बक्सर-कोईलवर तटबंध अब खतरे में, ग्रामीणों ने उठाई तत्काल संरक्षण की मांग

LHC0088 7 hour(s) ago views 600
  

मोरों का बक्सर-कोईलवर तटबंध अब खतरे में



विकास पांडेय, बक्सर। गंगा की लहरों के समानांतर फैला बक्सर-कोईलवर तटबंध आज एक बड़े अंतर्विरोध का गवाह बन रहा है। एक तरफ 52 किलोमीटर लंबी पक्की सड़क दियारा के गांवों को मुख्यधारा से जोड़कर आर्थिक समृद्धि लाने को जहां अपनी तैयारी में है। वहीं दूसरी ओर इस निर्माण ने देश के राष्ट्रीय पक्षी मोर और यहां के समृद्ध वन्यजीव तंत्र के अस्तित्व पर संकट के बादल गहरा दिए हैं।  

वर्षों से बबूल की घनी झाड़ियों और दलहन-तेलहन के खेतों में सुरक्षित रहने वाले मोरों के झुंड अब मशीनों की कर्कश गूंज और कंक्रीट के बिछावन के बीच बेदखल होने को मजबूर हैं। यह इलाका ऐतिहासिक रूप से गंगा, कर्मनाशा और सोन नदियों के बीच का एक ऐसा गलियारा रहा है, जहां मोर, हिरण, कृष्णमृग और नीलगाय समेत विभिन्न प्रकार के विलक्षण प्राणी एक साथ विचरण करते हैं।  
अर्जुनपुर से नैनीजोर तक का हिस्सा मोरों का स्वर्ग

अर्जुनपुर से नैनीजोर तक का हिस्सा मोरों का प्राकृतिक स्वर्ग माना जाता है। तटबंध की खराब हालत ही अब तक इनके लिए ढाल बनी हुई थी, क्योंकि बाहरी हस्तक्षेप सीमित था। लेकिन अब सड़क चौड़ीकरण के लिए काटी जा रही झाड़ियों की झनझनाहट इनसे सहन नहीं हो रहा है।  

इनके छिपने की जगह खत्म होती जा रही है। गंभीर बात यह है कि जहां पास के गोकुल जलाशय को 2025 में \“रामसर साइट\“ का दर्जा मिल चुका है और यहां गंगा डॉल्फिन व 50 से अधिक प्रवासी पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। वहीं इसी ईको-सिस्टम का हिस्सा होने के बावजूद सड़क परियोजना के समय इन वन्यजीवों के संरक्षण पर कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई।
संरक्षण के लिए उठी आवाज


हमने बचपन से इन तटबंधों पर मोरों को नाचते देखा है। वे हमारे परिवार का हिस्सा हैं। सड़क बनने से हमें खुशी है। लेकिन जिस तरह से बबूल की झाड़ियों को पूरी तरह साफ किया जा रहा है। उससे मोर असुरक्षित हो गए हैं। प्रशासन को चाहिए कि सड़क के किनारे तुरंत नए फलदार और छायादार पौधे लगाए जाएं ताकि उन्हें दोबारा बसेरा मिल सके। - पंकज उपाध्याय, युवा कांग्रेसी

केवल सड़क बना देना विकास नहीं है। इस इलाके में नीलगाय और हिरण भी बड़ी संख्या में हैं। जब गाड़ियां तेज रफ्तार से दौड़ेंगी तो ये बेजुबान सड़क हादसों का शिकार होंगे। हमारी मांग है कि पूरे 52 किलोमीटर के पैच में संवेदनशील जगहों पर स्पीड ब्रेकर बनाए जाएं और वाहनों की गति सीमा 30-40 किमी प्रति घंटा तय की जाए। - रमेश राय, प्रमुख प्रतिनिधि

मोर और अन्य जीव हमारे खेतों के प्राकृतिक संरक्षक हैं। वे कीड़े-मकोड़ों को खाकर हमारी फसलों को बचाते हैं। अगर शोर और मानवीय हस्तक्षेप के कारण ये यहा से पलायन कर गए तो हमारा कृषि पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ जाएगा। हम चाहते हैं कि इस सड़क को \“नो-हार्न जोन\“ घोषित किया जाए, ताकि मोरों की शांति भंग न हो। - गगन सिंह, पैक्स अध्यक्ष





यह चिंताजनक है कि वन विभाग के पास जिले के मोरों की कोई आधिकारिक गणना नहीं है। गोकुल जलाशय की तरह ही इन स्थलीय पक्षियों के लिए भी एक \“प्रोटेक्शन जोन\“ बनना चाहिए। सड़क निर्माण के दौरान कम से कम पेड़ों की कटाई होनी चाहिए थी। प्रशासन को स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर एक \“वन्यजीव मित्र\“ दस्ता बनाना चाहिए। - धनंजय मिश्रा, मुखिया
like (0)
LHC0088Forum Veteran

Post a reply

loginto write comments
LHC0088

He hasn't introduced himself yet.

410K

Threads

0

Posts

1410K

Credits

Forum Veteran

Credits
148452

Get jili slot free 100 online Gambling and more profitable chanced casino at www.deltin51.com