सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ऑनलाइन जुआ और सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा- यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। याचिका की एक कॉपी सरकार के वकील को दें। वह इसे देखेंगे और फिर अगली सुनवाई में हमें मदद करेंगे।
दरअसल, सेंटर फॉर एकाउंटेबिलिटी एंड सिस्टेमिक चेंज (CASC) और शौर्य तिवारी ने यह जनहित याचिका दायर की है। इसमें सरकार से मांग की गई है कि वह देशभर में तेजी से फैल रहे ऑनलाइन जुआ और सट्टेबाजी वाले एप्स पर सख्त कार्रवाई करें।
देश में करीब 65 करोड़ लोग ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर एक्टिव हैं। ज्यादातर लोग रियल मनी गेम्स में दांव लगाते हैं। इनका सालाना कारोबार 1.8 लाख करोड़ से ज्यादा है।

याचिकाकर्ताओं ने लॉ कमीशन की 276वीं रिपोर्ट का हवाला दिया है। इसमें कहा गया था, ‘महाभारत के समय जुआ नियंत्रित होता, तो युधिष्ठिर पत्नी और भाइयों को दांव पर नहीं लगाते।’ याचिका में कहा गया है कि यह कथन पौराणिक नहीं, सांस्कृतिक चेतावनी है कि अनियंत्रित जुआ समाज की नींव हिला सकता है।
आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के संसद में दिए बयान का भी हवाला देते हुए कहा गया है कि ‘ऑनलाइन मनी गेम्स ड्रग्स से बड़ा खतरा बन चुके हैं।’ मंत्रालय के अनुसार, इन एप्स के एल्गोरिद्म ऐसे होते हैं कि हार लगभग तय रहती है।
सातवीं अनुसूची में जुआ राज्य का विषय है। केंद्र का नया कानून राज्यों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करता है। यह कानून बेटिंग को विनियमित करने के बजाय वैधता देने का रास्ता खोलता है।
डीजीजीआई ने ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों से जुड़े 81,875 करोड़ की कर चोरी पकड़ी है। 642 ऑफशोर कंपनियां देश में बिना टैक्स दिए जुआ चला रही हैं। अधिकांश विदेशी सर्वरों पर संचालित होती हैं, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है।
फिल्मी सितारे और क्रिकेटर ऐसे एप्स का प्रचार कर रहे हैं, जो बच्चों को गलत दिशा में ले जाते हैं। अभिनेता अक्षय कुमार के बयान का हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने बताया था कि उनकी 13 साल की बेटी को एक ऑनलाइन गेम के दौरान यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि ‘ऑनलाइन गेमिंग डिसऑर्डर’ अब एक मानसिक बीमारी के रूप में दर्ज है।
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