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अमेरिका की निंदा के बजाय चुप रहकर हालात बदलना ज्यादा जरूरीः सिन्हा

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वेनेजुएला में भारतीय राजदूत रहे यशवर्धन कुमार सिन्हा। जागरण



रुमनी घोष। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उठा ले जाने की घटना से अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे के लिए खींची गई लकीरें मिटती दिखाई दे रही हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कई बार इन नियमों का उल्लंघन हुआ, लेकिन पहली बार राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इसे मानने से इनकार कर दिया। अराजकता और अनिश्चितता के बीच विश्व के सभी देशों के साथ भारत की कूटनीति व रणनीति दोनों की समीक्षा हो रही है। देश-विदेश में एक वर्ग भारत की चाल को सधा हुआ बता रहा है, वहीं एक वर्ग इसकी आलोचना कर रहा है।

ऐसे में वेनेजुएला में भारतीय राजदूत रहे यशवर्धन कुमार सिन्हा इस मौके का फायदा उठाते हुए नीतियों में सुधार की सलाह देते हैं। वह कहते हैं अमेरिका की निंदा करने से कुछ नहीं बदलेगा। इसके बजाय चुप रहकर हालात को अपने पक्ष में बदलने का मौका तलाशना चाहिए। हम कुछ हद तक यही कोशिश कर रहे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाए गए मानकों को पुनर्स्थापित करने की जरूरत महसूस करने वाले सभी देशों को मिलकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर को हटाए जाने व प्रमुख देशों को शामिल करने की मांग रखना चाहिए। यह मुश्किल है, लेकिन शुरुआत के लिए यही सही समय है। सिन्हा यूनाइटेड किंगडम व श्रीलंका में भारत के पूर्व उच्चायुक्त रहे हैं।

दुबई में भी भारत के काउंसल जनरल के पद पर रहे हैं। वर्ष 2019 से 2023 तक वह भारत सरकार में मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में पदस्थ रहे। वर्तमान में वह एसोसिएशन आफ इंडियन डिप्लोमैट्स के अध्यक्ष हैं। सिन्हा मूलतः बिहार के रहने वाले हैं। सिन्हा पूर्व सैन्य अधिकारी व जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल एस.के. सिन्हा के बेटे हैं। बिहार सेंट जेवियर्स हाईस्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद वह दिल्ली आ गए। सेंट जेवियर्स कालेज से एमए किया। उसके बाद विदेश सेवा के लिए चयनित हुए। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे वेनेजुएला की स्थिति व वैश्विक संकट पर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश :

वेनेजुएला की सैन्य व्यवस्था कैसी है? क्या वह अमेरिकी सेना को चुनौती दे सकती थी?

मामला अमेरिकी सेना को चुनौती देने का नहीं है, बल्कि हमले के विरोध में जवाबी कार्रवाई का है। माना कि अमेरिकी सेना नाइट स्टाकर्स तकनीक से लैस होगी, लेकिन वेनेजुएला मिलिट्री के पास भी अपना रडार सिस्टम है... मिसाइलें हैं। राष्ट्रपति की सुरक्षा में बड़ी संख्या में क्यूबन सिक्यूरिटी लगी हुई रहती है, मगर कहीं कोई प्रतिरोध नजर नहीं आता है। ये लोग क्या कर रहे थे। मुझे लगता है कि अमेरिकी सेना के पास कोई अंदरूनी सूचना थी।

क्या भीतरघात हुआ है?

हां। मुझे लगता है कि धोखा तो हुआ है... और वह मादुरो का बहुत करीबी या विश्वासपात्र होगा। अब इसमें एक, दो या तीन कितने लोग शामिल हैं, यह कहना मुश्किल है।

क्या भीतरघात में विपक्षी नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मारिया कोरिना मचाडो की भूमिका हो सकती है?

नहीं, मुझे नहीं लगता। वह बहुत समय तक वेनेजुएला से बाहर थीं, इसलिए उनके लिए सरकार में इतनी पैठ संभव नहीं है। अमेरिका ने मादुरो के किसी विश्वासपात्र को ही \“काम्प्रोमाइज\“ किया होगा।

भीतरघात के पुख्ता प्रमाण नहीं मिले हैं, फिर ऐसा सोचने की क्या वजह है?

राष्ट्रपति मादुरो जिस मीरा फ्लोरेस पैलेस में रहते हैं, वह मैंने देखा है। मीरा फ्लोरेस पैलेस वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अधिकारिक कार्यालय या आवास है और डाउन टाउन में स्थित है। मैं जानता हूं कि वहां घुसना इतना आसान नहीं होता। जिस वक्त मादुरो को उठाया गया, वह फ्लोरिफाइड सैन्य कैंप में थे। इस वजह से ही भीतरघात की बात को बल मिलता है।

आपके अनुसार इस हमले की वजह क्या है? अमेरिका के नार्कोटेरेरिज्म की दलील में कितना दम है?

साफ-साफ यह तेल का खेल है। इसे इस तरह से समझिए... वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है। यहां 303 बिलियन बैरल तेल भंडार है। यह सऊदी, कुवैत और रूस की तुलना में ज्यादा है। फर्क यह है कि इनका जो तेल है, उसे \“हैवी सावर क्रूड\“ कहते हैं। इसे रिफाइन करने की लागत ज्यादा है और प्रक्रिया थोड़ी लंबी है। भारत में भी रिलायंस या एसआर जैसी दो या तीन कंपनियां ही हैं, जिनके पास इस क्रूड आइल को रिफाइन करने की सुविधा है। वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने भी शुक्रवार को अपने संबोधन में यही बात कही।

ट्रंप दावा कर रहे हैं कि वेनेजुएला अमेरिका का तेल चुरा रहा है। क्यों और कैसे?

वेनेजुएला की जमीन पर तेल का भंडार है तो तेल उसी देश का होगा। ट्रंप जो दावा कर रहे हैं, इसे समझने के लिए आपको वेनेजुएला की राजनीतिक पृष्ठभूमि, चर्चित बोलिवेरियन क्रांति और तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण के दौर में झांकना होगा। वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज 1999 में सत्ता में आए थे। इससे पहले वेनेजुएला सरकार पूरी तरह से अमेरिका समर्थित होती थी। अमेरिकन तेल रिफाइन कंपनियों ने यहां बहुत बड़े पैमाने पर निवेश किया था। कुछ बड़ी यूरोपीय रिफाइनरी भी थीं। इन कंपनियों ने बहुत दोहन किया और बहुत पैसा बनाया।

वेनेजुएला के चंद उद्योगपतियों को इसका फायदा मिला, लेकिन आम आदमी बहुत परेशान था। इसकी वजह से समाज में अस्वाभाविक असंतुलन की स्थिति निर्मित हो गई। उस दौर में श्रमिक नेता के रूप में उभरे ह्यूगो शावेज ने तेल उद्योग के खिलाफ अभियान छेड़ा और गरीबों का मसीहा बनकर सोशलिस्ट एजेंडे के साथ सत्ता में आए। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने तेल उद्योगों का राष्ट्रीयकरण के लिए \“बोलिवेरियन क्रांति\“ छेड़ी। तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद सरकारी तेल व गैस कंपनी पेट्रोलेओस द वेनेजुएला (पीडीवीएसए) का गठन हुआ। जब मुनाफा कम होने लगा तो अमेरिकन कंपनियां व इंजीनियर्स वहां से काम छोड़कर चली गईं। इससे उनका तेल उद्योग कोलाप्स (धराशायी) करने लगा। हालांकि उसके बाद रूस और चीनी कंपनियों ने निवेश किया। भारत की ओएनजीसी की ओवीएल (ओएनजीसी विदेश लिमिटेड) भी वहां पहुंची। जब 2007-2009 में मैं वहां पदस्थ था, तो सैंटक्रिस्तोवाल कंपनी के साथ ओविल ने रिफाइनिंग का काम शुरू किया।

इसके लगभग दो साल बाद वेनेजुएला के तेल उद्योग को सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब दो लाख बैरल प्रतिदिन तेल रिफाइन करने वाली एक्जोमोविल कंपनी वहां से छोड़कर चली गई। बाद में इसे पेट्रो ब्राजील सहित चार-पांच कंपनियों को सौंपा गया। इसमें भारत की ओविल भी शामिल थी और उसकी 10-12 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। उस समय हम वेनेजुएला से तेल खरीद भी रहे थे। रिलायंस डेढ़ लाख बैरल तेल प्रतिदिन खरीद रहा था। वर्ष 2014-15 तक काफी बढ़ा। हालांकि उसके बाद प्रतिबंध लगने लगे तो यह कम होने लगा। अब तो लगभग बंद ही है। तेल उद्योग के बिखरने के साथ ही वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था भी पूरी तरह से चरमरा गई।

क्या अमेरिका की नजर सिर्फ तेल पर है या अन्य संसाधनों पर भी है?

वेनेजुएला बहुत खूबसूरत देश है। यहां तेल तो है ही, इसके अलावा यहां सोना, लौह अयस्क, रेयर अर्थ मेटरियल (दुर्लभ खनिज) है। इसके अलावा बहुत सुंदर समुद्री तट (बीचेस) हैं, दूसरी ओर पहाड़ हैं। यहां दुनिया का सबसे ऊंचा एंजेल वाटर फाल (जल प्रपात) है, जिसकी वजह से पानी की प्रचुरता है। एक समय कराकस को पेरिस ऑफ साउथ अमेरिका कहते थे। ट्रंप कह रहे हैं कि वेनेजुएला को चलाएंगे तो इन चीजों पर भी उनकी नजर होगी।

अमेरिकी राजदूत, माइक वाल्ट्ज ने इसे \“सर्जिकल कानून प्रवर्तन आपरेशन\“ बताया। पनामा पर कार्रवाई की उतनी आलोचना नहीं हुई थी, जितनी वेनेजुएला पर हो रही है क्यों?

पनामा और वेनेजुएला पर कार्रवाई का एक ही आधार नार्को टेरेरिज्म (नार्को आतंकवाद) या ट्रैफिकिंग (तस्करी) बताया जा रहा है, लेकिन दोनों में काफी अंतर है। पनामा में अमेरिकी सैनिक पहले से ही मौजूद थे। जनरल मैनुअल को अमेरिका ने ही खड़ा किया था। 1989 में पूर्व राष्ट्रपति जार्ज एच. डब्ल्यू बुश के समय जनरल मैनुअल नोरिएगा को सैन्य कार्रवाई कर उन्हें गिरफ्तार किया गया था, जबकि वेनेजुएला स्वतंत्र देश है। वहां अमेरिकी सैनिक मौजूद नहीं थे। रात को डेल्टा फोर्स भेजकर किसी देश के राष्ट्रपति को उठा लेना \“अपहरण\“ है। पूरी दुनिया इस तरह की कार्रवाई का अनुमान नहीं लगा पाई थी।

रूस-यूक्रेन युद्ध नहीं रुकवा पाना, चीन का बढ़ता प्रभुत्व, यूरोप से बढ़ती दूरियां और डालर को चुनौती जैसी घटनाओं से अमेरिका का प्रभुत्व घट रहा है। वर्ल्ड आर्डर बदल रहा है। क्या इस वजह से ट्रंप इस तरह की कार्रवाई कर पश्चिमी गोलार्ध सहित पूरी दुनिया में अमेरिकी प्रमुखता को बहाल करना चाहते हैं?

नहीं। अमेरिका की सैन्य क्षमता से हर कोई परिचित है और ट्रंप को यह साबित करने की जरूरत नहीं है। जहां तक वर्ल्ड आर्डर बदलने की बात है, तो यह तो जरूर बदलेगा। चीन चुनौती दे रहा है। भारत भी आगे बढ़ रहा है। अमेरिका उन्हें रोकने की कोशिश जरूर करेगा। भारत के खिलाफ टैरिफ एक्शन इसका एक हिस्सा हो सकता है। हालांकि वेनेज़ुएला पर की गई कार्रवाई का इससे कोई संबंध नहीं है।

वेनेज़ुएला के बाद ट्रंप की नजर मेक्सिको, क्यूबा और ग्रीनलैंड पर है। क्या दुनिया अब \“जिसकी लाठी, उसकी भैंस...\“ के तर्ज पर चलेगी?

सही है। दुनिया अभी उसी तर्ज पर चल रही है-जिसकी लाठी, उसकी भैंस। ट्रंप का लक्ष्य स्पष्ट है कि सिर्फ और सिर्फ अमेरिकियों का फायदा होना चाहिए। बाकी दुनिया से उन्हें कोई मतलब नहीं है। यूनिलैटरल (बिना दूसरे पक्ष की सहमति के की गई कार्रवाई) कार्रवाई के लिए तो पूरी दुनिया तैयार है, लेकिन किसी देश के राष्ट्रपति को उठा लिया जाएगा। यह पूरी दुनिया अनुमान नहीं लगा पाई थी। अमेरिका के पास हमेशा से ही दुनिया की सबसे ताकतवर व तकनीक युक्त सैन्य बल मौजूद है। इस सैन्य ताकत के साथ वहां की जनता ने ट्रंप जैसे शासक को चुनकर राष्ट्रपति बना दिया।

तो क्या कोई भी देश किसी पर भी हमला कर कब्जा कर लगेगा? चीन ताईवान पर कब्जा कर लेगा?

जहां तक कब्जे की बात है तो यहां बात कोई भी देश नहीं, अमेरिका की हो रही है। हां, इतना कह सकते हैं इससे चीन के लिए ताईवान पर दखल आसान हो गया है। अब चाहे चीन सैन्य कार्रवाई करे या फिर हांगकांग की तरह वार्ता के जरिये उसे अपने में मिला ले। यह कदम वही देश उठा पाएगा, जिसके पास उतनी सैन्य क्षमता होगी।

इस तरह तो अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचा पूरी तरह चरमरा जाएगा?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएन सिक्यूरिटी काउंसिल) में रिफार्म ही एक मात्र रास्ता नजर आता है। इसमें सभी देश वीटो पावर को खत्म करने की मांग करें। अस्थायी सदस्यों की भूमिका बढ़े। यह आसान नहीं है, लेकिन अमेरिका को छोड़कर वीटो पावर रखने वाले दूसरे देश व अस्थायी सदस्यों को लगातार इसकी मांग उठानी होगी। हर साल एक रेज्यूलेशन पास करनी होगी। यह आसान नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था को दोबारा स्थापित करने के लिए यह जरूरी है।

आपके राजनयिक करियर का कोई ऐसा मामला, जिसमें आलोचनाओं के बीच भारत सरकार ने परिस्थितियों को पलट दिया?

परमाणु परीक्षण के ठीक बाद...। मई 1998 में परमाणु परीक्षण हुआ था। उस समय मैं पाकिस्तान में पदस्थ था। मैं जानता हूं कि कैसे हमने हालात संभाले। चंद महीनों बाद मेरी पोस्टिंग न्यूयार्क स्थित यूएन (संयुक्त राष्ट्र) में हो गई। यूएन में अलग-अलग देशों के मुख्यमंत्री व मंत्री आकर जनरल डिबेट सेगमेंट में भाग लेते हैं। अपने विचार रखते हैं। इसके नोट्स लेने के लिए मुझे जनरल असेम्बली हाल में बिठा दिया गया। दिल्ली से निर्देश मिला कि सुबह से शाम तक जो कुछ भी हो, उसकी रिपोर्ट बनाकर ई-मेल किया जाए। उस समय मैंने देखा कि उस समय हर देश हमारी निंदा कर रहा था।

कुछ ही देश होंगे जो हमारी निंदा नहीं कर रहे थे। वही अमेरिका जिसने हम पर सैंक्शंस (प्रतिबंध) लगाया था, उसने ही बाद में हमारे साथ न्यूक्लियर डील किया। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। जसवंत सिंह व यशवंत सिन्हा ने विदेश मंत्री रहते हुए बहुत कुछ सहा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने उस परेशानी को अवसर में बदल दिया। उसके बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उसी नीति को आगे बढ़ाते हुए न्यूक्लियर डील को अंजाम दे दिया। इसे मैं \“पासिंग द फेज\“ कहता हूं। यानी एक चरण को पार करना है।

बतौर राजनयिक जब आपके सामने देश की आलोचना होती है, तो कैसे संयत रहते हैं?

किसी भी देश के राजनयिक आपस में आलोचनात्मक व आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग नहीं करते हैं। जब हम टेबल पर आमने-सामने बैठते हैं तो अपने-अपने देश का पक्ष रखते हैं। ट्रंप व उनके ट्रेड डील सलाहकार जैसे कुछ लोगों को छोड़ दें तो इस तरह की भाषा आप नहीं सुनेंगे। अब आप मार्क रुबियो को ही देखिए, वह कभी इस तरह की भाषा बोलते हुए नहीं सुनेंगे।

भारत ने इस प्रसंग में प्रतिक्रिया तो व्यक्त की, लेकिन निंदा नहीं की। अमेरिका का नाम लेने में संकोच या परहेज करने पर भी आलोचना हो रही है। \“चुप्पी\“ के पीछे की रणनीति क्या है?

आप मुझे बताइए, क्या अमेरिका की निंदा करने से हालात बदल जाएंगे। इससे ज्यादा जरूरी है कि चुप रहकर हालात बदले जाएं। भारत सरकार ने कदम उठाया है, वह बहुत सोच-समझकर लिया है। जब आप टेबल पर डील करने बैठते हैं, तो स्थितियां बहुत अलग होती हैं। अमेरिका वैसे ही भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

50 प्रतिशत टैरिफ की वजह से हमारे कपड़ा उद्योग सहित कई क्षेत्र पर असर पड़ना शुरू हो गया है। एक प्रतिक्रिया के बाद यदि अमेरिका 200 प्रतिशत टैरिफ लगा देता है, तो क्या हम उस स्थिति को संभाल पाएंगे। भारत सरकार धीरे-धीरे यूरोप सहित अन्य देशों के साथ व्यापारिक रिश्ते बढ़ा रही है। बेशक, यह यूएस जितना बड़ा बाजार नहीं है, लेकिन वैकल्पिक तो है।

क्या भारत के साथ अमेरिका कभी ऐसा व्यवहार हो सकता है?

पहला, हम वेनेजुएला नहीं हैं...। दूसरा, हम 145 करोड़ हैं और तीसरा, हम परमाणु शक्ति हैं। मुझे नहीं लगता कि हमारे साथ इस तरह के व्यवहार की कोई वजह है। यूएस के साथ अभी भी हमारे बहुत गहरे संबंध हैं। हम चीन को प्रोत्साहन नहीं दे रहे हैं। हमें पता है कि चीन कभी हमारा दोस्त नहीं होने वाला है। मैं अंदाज से आपको एक उदाहरण देता हूं कि जहां तक रूस से तेल खरीदने की बात है तो यदि वेनेज़ुएला का तेल बाजार में आ जाता है और वह सस्ता हो, तो हम रूस से तेल खरीदना कम करके अमेरिका से तेल खरीदने लगेंगे। इससे अमेरिका की नाराजगी कम हो जाएगी।

यदि अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते और बिगड़ते हैं तो फिर भारत को क्या करना चाहिए?

भारत को चीन की तरह 1000 टैलेंट प्रोग्राम चलाना चाहिए। इसके तहत अमेरिका गए प्रतिभाशाली युवा किसी और देश में जाने के बजाय भारत लौटें। उनके लिए सरकार विशेष प्रोग्राम चलाएं और नया क्षेत्र विकसित करें।
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