जागरण संवाददाता, मैनपुरी। जिले में पशुपालन विभाग की बदहाल व्यवस्था एक बार फिर सामने आ गई है। हालात यह हैं कि एक पशु चिकित्सक पर औसतन 38 हजार से अधिक पशुओं के इलाज की जिम्मेदारी है। इसका सीधा असर ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है, जहां बीमार पशुओं को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा और पशुपालकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई बार मामूली बीमारी भी समय पर उपचार न मिलने के कारण गंभीर रूप ले लेती है, जिससे पशुपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में पशु चिकित्सकों के कुल 35 पद सृजित हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 22 चिकित्सक ही तैनात हैं। शेष पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। इसके चलते कई विकास खंडों में एक ही डाक्टर को पूरे ब्लाक के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ रही है। दूर-दराज के गांवों में बीमार पशुओं को इलाज के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है और कई बार पशु चिकित्सक के न पहुंच पाने से पशुओं की हालत और बिगड़ जाती है।
पशुपालन विभाग के रिकार्ड बताते हैं कि जिले में गोवंश 93538, भैंस 447106, भेड़ 32510, बकरी 258862, घोड़ा 166, खच्चर 22, गधा 1, ऊंट 3, खरगोश 64, कुत्ता 1480 व अन्य पशुओं की संख्या है। इतनी बड़ी पशुधन आबादी के सामने चिकित्सकों की कमी व्यवस्था को चरमरा रही है।
शासन को रिक्त पदों की रिपोर्ट भेज दी गई है और जल्द नई नियुक्तियां होने की उम्मीद है। तब तक सीमित संसाधनों में ही पशुपालकों को बेहतर सेवाएं देने का प्रयास किया जा रहा है। - डा. सोमदत्त सिंह, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी |
|