चकराता क्षेत्र में रिकार्ड तोड़ पाले के कारण जनजीवन प्रभावित। जागरण
संवाद सूत्र, चकराता। चकराता क्षेत्र में इस बार न बारिश हुई और न बर्फबारी हुई, लिहाजा पहाड़ सूखे पड़े हैं। सेब बगीचों में पाले से नुकसान हो रहा है। रात में चकराता क्षेत्र का पारा माइनस तीन डिग्री तक पहुंचने की वजह से पानी जम रहा है। पाइप लाइनों में पानी जमने से आपूर्ति प्रभावित हो रही है। पेड़ों पर जमा पाला बर्फ की तरह से दिखाई दे रहा है।
बीते कई दशकों में चकराता क्षेत्र ने कड़ाके की सर्दी देखी है, परंतु इस बार पाले ने वह रूप दिखाया है, जो बुजुर्गों की स्मृतियों में भी कम ही दर्ज है। रातभर गिरने वाले जबरदस्त पाले ने पेड़-पौधों को झुलसा दिया है और खेतों, सड़कों और आंगनों में सुबह का दृश्य ऐसा प्रतीत होता है मानो बर्फबारी हो गई हो।
स्थानीय बुजुर्ग टीकाराम शाह, अर्जुन दत्त जोशी, श्रीचंद जोशी, दलीप सिंह रावत, शशिया भारती, राजेंद्र चौहान, जगतू दास, ईनारू आदि का कहना है कि पहले समय में ठंड के साथ नियमित बर्फबारी होती थी, जिससे जमीन में नमी बनी रहती थी और फसलों को प्राकृतिक संरक्षण मिलता था। लेकिन लगातार पांच महीनों से मौसम का शुष्क बना रहना और वर्षा और बर्फबारी का न होना इस बार की ठंड को सूखी ठंड में बदल चुका है, जो स्वास्थ्य व उपज के लिए सबसे अधिक घातक मानी जाती है।
रात के समय यदि पानी के बर्तन खुले में रह जाएं तो सुबह तक उन पर बर्फ की मोटी परत जम जाना अब आम बात हो गई है। कई ऊंचाई वाले गांवों में नदी-नाले, प्राकृतिक जलस्रोत और यहां तक कि पेयजल लाइनें भी जमने लगी हैं। यह स्थिति न केवल दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही है, बल्कि क्षेत्र की पारंपरिक जीवनशैली पर भी गहरा असर डाल रही है। बुजुर्ग बताते हैं कि चकराता की आर्थिकी का मजबूत आधार बागवानी रही है, विशेषकर सेब की खेती। लेकिन इस वर्ष पाले ने सबसे बड़ा प्रहार बागवानी पर किया है।
स्थानीय किसान और बागवान महाबल सिंह नेगी, यशपाल रावत, बृजेश कुमार जोशी, गौरव चौहान, देवेंद्र चौहान, महावीर रावत आदि का कहना है कि पाले के कारण सेब के पेड़ झुलसने लगे हैं। उनका यह भी कहना है कि यदि समय पर बर्फबारी होती तो यही बर्फ सेब के पेड़ों के लिए संजीवनी का कार्य करती, जिससे चिलिंग प्वाइंट विकसित होता और आने वाले मौसम में अच्छी पैदावार की उम्मीद बनती है। बर्फबारी के अभाव में न केवल वर्तमान फसल प्रभावित हुई है, बल्कि भविष्य की बागवानी भी संकट में नजर आ रही है। सर्दी के इस कहर का असर जनजीवन पर भी स्पष्ट दिख रहा है।
लोग अत्यधिक ठंड के कारण घरों में दुबके रहने को मजबूर हैं, सुबह देर से घरों से निकलना आम हो गया है। बाजारों में रौनक कम है और गांवों में दिनचर्या धीमी पड़ गई है। आज जब जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए चुनौती बना हुआ है, चकराता का यह अनुभव आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी के रूप में उभर रहा है। यह पाला केवल मौसम की घटना नहीं, बल्कि उस बदलते पर्यावरण का संकेत है, जो पारंपरिक पहाड़ी जीवन, खेती और संस्कृति को नए संकटों की ओर धकेल रहा है।
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