झारखंड के जंगलों में हाथियों का आतंक। फाइल फोटो
जागरण संवाददाता, चक्रधरपुर। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में हाथी के हमले से 6 दिनों में 17 लोगों की जान जा चुकी है। जिसके बाद हाथियों से लोगों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
जंगल की अवैध कटाई के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में हाथियों का आतंक निरंतर बढ़ रहा है। जंगल की अवैध कटाई के कारण हाथियों के रहने के सुरक्षित स्थान नष्ट हो गए हैं। भोजन की कमी हो गई है। राज्य सरकार का \“एलिफेंट प्रोजेक्ट\“ फ्लॉप शो बनकर रह गया है।
हाथियों की शरण स्थली सारंडा, पोड़ाहाट व कोल्हान के जंगल दिनों दिन नष्ट होते जा रहे हैं। घने जंगल नष्ट होने की वजह से इन दिनों गोईलकेरा प्रखंड, टोन्टो प्रखंड समेत अन्य क्षेत्रों में जंगली हाथियों का आतंक राज है। हाथियों के भय से शाम होते ही लोग अपने अपने घरों में दुबक जाते हैं।
सभी रास्ते अघोषित कर्फ्यू के समान लगते हैं। लोगों का राह चलना बन्द हो गया है। ग्रामीण बाजा-गाजा, पटाखे व मशाल जलाकर हाथियों का भगाने का प्रयास करते रहे हैं, लेकिन ग्रामीणों को सफलता नहीं मिलती। अक्सर हाथियों का झुण्ड किसी न किसी गांव में पके धान खाकर व पैरों से रौंदकर हाथियों का झुण्ड फसल नष्ट कर रहा है।
सरकार के प्रयास हुए फेल
हाथियों का आतंक को रोकने एवं हाथियों को जंगल में सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा \“एलिफेन्ट प्रोजेक्ट\“ तैयार किया गया था। प्रोजेक्ट के तहत जंगल में हाथियों को सुरक्षित स्थान प्रदान करने, जंगल की पहाड़ी में जल संग्रह करने, हाथियों के लिए भोजन उपलब्ध कराने आदि कई योजनाएं बनाई गई थी।
ये योजनाएं वर्षो बीतने के बाद भी केवल फाइलों तक ही सीमित रह गई हैं। हाथियों द्वारा फसल नष्ट किए जाने पर मुआवजे के भुगतान का प्रावधान है। लेकिन वन विभाग की लापरवाही व लम्बी प्रक्रिया के कारण कृषक मुआवजे से भी वंचित रहते हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि फसल क्षति की सूचना वन विभाग को देने के बाद भी विभाग के पदाधिकारी निरीक्षण करने नहीं आते। शिकायत पर अमल नहीं किया जाता।
शिकायत पर नहीं होता अमल
ग्रामीणों ने बताया कि हाथियों के आतंक की शिकायत करने पर विभाग के पदाधिकारी कहते हैं कि \“\“हाथी जंगली जानवर है, गाय बैल जैसे बांधकर रखा नहीं जा सकता।\“\“ हाथियों को भगाने के क्रम में प्रतिवर्ष हर क्षेत्र में लोगों को बड़ी संख्या में प्राण गंवाने पड़ रहे हैं, जिसके कारण अब लोग हाथियों को भगाने के लिए भी घर से निकलने का साहस नहीं जुटा पाते।
वन विभाग जंगल को सुरक्षा प्रदान करने में असमर्थ है। अस्सी के दशक के पूर्व जंगल से पत्ता लाने तक के लिए भी लोग डरते थे। शहीद देवेन्द्र माझी के नेतृत्व में जल, जंगल जमीन पर अधिकार जमाने के नाम पर जंगल की अवैध कटाई प्रारंभ हुई थी, जो आज भी जारी है।
लकड़ी माफिया साठगांठ कर प्रतिदिन लाखों रुपये की कीमती लकड़ी पड़ोसी राज्यों मे ले कर बेचते हैं। लकड़ी तस्करी में कई बार खाकी वर्दी वाले भी पकड़ में आए, लेकिन तस्करी बदस्तूर जारी है।
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