महिला वकीलों के उत्पीड़न पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों के खिलाफ उत्पीड़न की घटनाओं की रोकथाम और निवारण के लिए प्रभावी आंतरिक तंत्र स्थापित करने की याचिका पर मंगलवार को विभिन्न उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल से स्थिति रिपोर्ट मांगी है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जायमाल्या बागची की पीठ रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें विशाखा दिशा-निर्देशों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी, जिसमें देश के उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों में जेंडर सेंसिटाइजेशन एंड इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (जीएसआइसीसी) की स्थापना भी शामिल है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सोनिया माथुर ने अदालत के समक्ष चार्ट प्रस्तुत किया जिसमें अनुपालन में महत्वपूर्ण कमियों को दर्शाया गया था। उन्होंने कहा, सात हाई कोर्ट ऐसे हैं जहां कोई दिशा-निर्देश या नियम नहीं बनाये गए। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल से स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका महिला वकील ने दायर की है, जो देश के विभिन्न न्यायालयों में प्रैक्टिस कर रही हैं। याचिका में उन्होंने अपने मौलिक अधिकारों की समानता, गरिमा और न्यायालय परिसर में सुरक्षित कार्य वातावरण की रक्षा की मांग की है।
याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने ने पहले ही बार के सदस्यों और सभी हितधारकों के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन एंड इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (जीएसआइसीसी) का गठन करके सक्रिय कदम उठाए हैं। हालांकि, उच्च न्यायालयों, जिला न्यायालयों, न्यायाधिकरणों या बार संघों में कोई समान संरचना नहीं है जिस कारण महिलाओं के लिए संस्थागत संरक्षण में कमी है।
विशाखा दिशानिर्देश कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1997 में जारी किए गए दिशा-निर्देश हैं, इसके तहत 10 से अधिक कर्मचारी वाली हर संस्था में आंतरिक शिकायत समिति बनाना अनिवार्य है। (समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ) |
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