कैसे हुई मॉडर्न सर्कस की शुरुआत? (Picture Courtesy: Instagram)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज जब हम रंग-बिरंगे तंबू, जोकर की हंसी और कलाकारों के हैरतअंगेज कारनामे देखते हैं, तो शायद ही हमें पता होता है कि इसकी शुरुआत एक छोटी-सी घुड़सवारी रिंग से हुई थी।
जी हां, आधुनिक सर्कस का सफर फिलिप एस्टली की संघर्ष, जुनून और नए प्रयोगों की एक अनोखी दास्तां कहता है। आइए जानें आज का सर्कस पहले कैसा दिखता था और इसे यह नाम कैसे मिला।
सेना से सर्कस तक- फिलिप एस्टली का सफर
आधुनिक सर्कस के जनक माने जाने वाले फिलिप एस्टली का जन्म 8 जनवरी 1742 को इंग्लैंड में हुआ था। उनके पिता एक बढ़ई थे और चाहते थे कि बेटा भी वही काम सीखे। लेकिन फिलिप का दिल तो घोड़ों में बसता था। पिता से इसी बात पर अक्सर झगड़ा होता और आखिरकार तंग आकर फिलिप घर से भाग गए। उन्होंने सेना की कैवेलरी रेजिमेंट जॉइन कर ली, जहां उन्हें अपने शौक को जीने का मौका मिला।
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एक सफेद घोड़ा और पहली रिंग
1766 में जब एस्टली ने सेना छोड़ी, तो उन्हें उपहार में एक सफेद घोड़ा मिला। इसके बाद 9 जनवरी 1768 को उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर लंदन में \“एस्टली राइडिंग स्कूल\“ खोला। वे सुबह लोगों को घुड़सवारी सिखाते और दोपहर में घोड़े की पीठ पर खड़े होकर संतुलन बनाने जैसे हैरतअंगेज करतब दिखाते थे। यहीं से दुनिया के पहले आधुनिक सर्कस की नींव पड़ी। हालांकि उस समय इसमें केवल एस्टली और उनकी पत्नी ही शामिल थे।
42 फीट का वह जादुई घेरा
सर्कस की रिंग हमेशा गोल ही क्यों होती है? इसका जवाब भी फिलिप एस्टली की कहानी में छिपा है। उन्होंने घोड़ों के दौड़ने और संतुलन बनाने के लिए 13 मीटर यानी 42 फीट डायमीटर की एक गोल रिंग बनाई। दिलचस्प बात यह है कि आज भी पूरी दुनिया में सर्कस रिंग का मानक यही माना जाता है। समय के साथ उन्होंने सिर्फ घोड़ों तक सीमित न रहकर जोकर, रस्सी पर चलने वाले बाजीगर और पहलवानों को भी अपने शो का हिस्सा बनाया।
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कैसे मिला \“सर्कस\“ नाम?
शुरुआत में इसे \“सर्कस\“ नहीं कहा जाता था। यह नाम ब्रिटेन के मशहूर संगीतकार और अभिनेता चार्ल्स डिबडिन ने दिया। 1782 में उन्होंने प्राचीन रोमन \“सर्कस मैक्सिमस\“ से प्रेरित होकर अपने शो का नाम \“सर्कस\“ रखा। उन्होंने घुड़सवारी के साथ संगीत और नाटक को जोड़कर इसे और भी मनोरंजक बना दिया।
कैसे घर-घर तक पहुंचा सर्कस?
सर्कस की पहचान कहे जाने वाले \“कैनवास के तंबू\“ की शुरुआत 1825 में जोशुआ परडी ब्राउन ने की थी। इससे पहले सर्कस केवल स्थायी इमारतों में होते थे, लेकिन तंबू के आने से सर्कस \“घुमंतू\“ बन गया। रेलवे के विस्तार ने इसे और आसान बना दिया, जिससे सर्कस बड़े शहरों से निकलकर छोटे गांवों और कस्बों तक पहुंचने लगा।
व्यावसायिक क्रांति और मल्टी-रिंग शो
1871 में पी. टी. बार्नम ने \“ग्रेटेस्ट शो ऑन अर्थ\“ की शुरुआत कर सर्कस को एक बड़ा व्यापार बना दिया। बाद में 1881 में जेम्स बेली के साथ मिलकर उन्होंने एक ही समय में कई रिंगों वाले \“मल्टी-रिंग\“ सर्कस की शुरुआत की, जिसने दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया।
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