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Mahabharata Bhakti: भक्त और भगवान का रिश्ता।
स्वामी मैथिलीशरण, (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। भक्ति महाभारत का वह अमृतमय अंश है, जिसके लिए कृष्णद्वैपायन वेदव्यास को श्रीमद्भागवत की रचना करनी पड़ी। कृष्ण के अतिरिक्त महाभारत का इतिहास और घटनाक्रम उस प्राणहीन ऊसर भूमि की तरह है, जिसमें भक्ति का तृण भी नहीं उपज सकता था। न जाने कितनी बार भीष्म का हृदय स्वयं से युद्ध करता है। भीष्म अपने आप से युद्ध करते हैं, जिसमें वे विजयी होकर धन्य हो गए। दुर्योधन की ओर से युद्ध करने वाले योद्धा का उद्देश्य श्रीकृष्ण भक्त को प्रभुभक्ति का कृपामृत और करुणामृत पान कराना हो सकता है, जो सामान्य तौर पर समझ नहीं आता है। महाभारत के शांति-पर्व में कुरुक्षेत्र की भूमि पर श्रीकृष्ण की जिस प्रकार स्तुति पितामह भीष्म ने की है, वैसी लोकोत्तर में कहीं संभव प्रतीत नहीं होती है। उन्होंने श्रीकृष्ण की व्यापकता का जो उद्घोष अपने देहांत से पूर्व किया, उससे सिद्ध हो गया कि भीष्म अपनी मृत्यु के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा न करके, उन श्रीकृष्ण की प्रतीक्षा कर रहे थे, जिनके रोम-रोम में कोटि-कोटि सूर्य प्रकाशित हो रहे हैं।
वे उन क्षेत्रज्ञ श्रीकृष्ण के माधुर्य और तत्व के साथ उनकी भक्तवत्सलता की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे अपने नेत्रों में सूर्य के प्रकाशक तत्व उस सूर्य को भर लेना चाहते थे, जिसे देखने के लिए भौतिक रूप से दिखाई देने वाला सूर्य आज स्वयं भीष्म के भक्तिभाव में श्रीकृष्ण की करुणा का प्रतिफल देखकर अनंत सुख का अनुभव करेगा।
दिशा-विदिशा सब हैं
मृत्यु से पूर्व शरशय्या पर पड़े भीष्म कहते हैं, हे देवकीनंदन प्रभु! आपका आदि अंत कुछ नहीं है। आप अनादि हैं, क्योंकि यदि आप केवल पृथ्वी होते तो जहां तक पृथ्वी है, वहां से आपका आदि और किसी सीमा पर आपका अंत स्वयं सिद्ध हो जाता, पर आप तो जल भी हैं आकाश भी हैं। वायु, अग्नि, चंद्रमा, तारे, ग्रह, नक्षत्र, भूगोल, खगोल, प्रकृति सबके जनक आप ही हैं। ज्ञान, कर्म, उपासना तथा शरणागति का परम तत्व सब कुछ आपसे ही निश्रित, परिक्षित और प्रकाशित है (श्रीकृष्ण वेदों के आश्रय हैं)। सांख्यमत के अनुसार, श्रीकृष्ण 16 विकारों से आवृत होने पर भी विकारों के साक्षी होकर निर्विकार हैं। 17वां तत्व जो पुरुष है, वे साक्षात श्रीकृष्ण ही हैं। वे दिशा-विदिशा सब हैं।
अर्थात भीष्म कहते हैं, युग के प्रारंभ में आप ब्रह्म तथा युगांत में आप ही संकर्षण हैं। योगी लोग समाधि में जिस तुरीय में स्थित होते हैं, वह तुरीय और योगियों के परम लक्ष्य स्वरूप आप ही हैं। संन्यासियों के मोक्ष और गृहस्थों के परम ध्येय, ज्ञेय और अनुकरणीय आप ही हैं।
द्रौपदी के चीरहरण का प्रसंग
सारे संसार को धृतराष्ट्र की सभा में द्रौपदी के चीरहरण का प्रसंग सालता रहता है कि दुश्शासन द्वारा द्रौपदी के चीर हरण में यह कृष्णभक्त क्यों कुछ नहीं बोला। द्वापर काल की तत्कालीन राज्य व्यवस्था को अर्थहीन मानते हुए भी उस परंपरा के शव दाह को अग्नि देते हुए भी भीष्म केवल इसलिए नहीं बोले, क्योंकि वह द्वापर में होने वाले महायुद्ध में कृष्ण की अनंतता और अपने परिवार की पुत्रवधू द्रौपदी की कृष्णभक्ति में अपनी समस्त उपलब्धियों की आहुति देकर उसके भावों का अवतरण देखना चाहते थे।
साथ ही द्रौपदी की उस भक्ति सरिता में अवगाहन करना चाहते थे, जो समस्त प्रतिकूलताओं को शिरोधार्य करके निरंतर प्रवहमान रहकर श्रीकृष्ण के कृपासमुद्र में मिलकर धन्यता को प्राप्त होनी थी। सभा में भीष्म के मौन ने द्रौपदी की कृष्णभक्ति की प्राणप्रतिष्ठा की और भावबिहारी भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने कृपावस्त्र के द्वारा द्रौपदी का पूजन किया।
शरणागत वत्सलता का स्मरण
शांतनु पुत्र भीष्म पितामह होकर भी इसलिए कुछ नहीं बोले, क्योंकि वह जानते थे कि उनकी बेटी द्रौपदी अपने जीवन में दुर्योधन, दुश्शासन और कर्ण की इस घृणित मैत्री का दुष्परिणाम कभी नहीं भूलेगी। भीष्म चाहते थे कि द्रौपदी जब-जब इस काल को स्मरण करे, तो कृपा के रूप में वह अपने पितामह के रूप में मेरी याद न करके वह मेरे प्यारे श्रीकृष्ण के माधुर्यपूर्ण पराक्रम तथा शरणागत वत्सलता का स्मरण कर उनकी भक्ति में डूबी रहे। उनका यह भाव था कि यदि मैं अपने पराक्रम द्वारा इस समय दुश्शासन का वध कर देता हूं तो यह घटना मेरे अहंकार और पौरुष की स्थापना तो कर देगी, पर श्रीकृष्ण की लीला के दर्शन संसार के आर्त भक्तों का भरोसा नहीं बन पाएंगे।
यदि वह मुझे याद करेगी तो इसके हृदय में जो श्रीकृष्ण भक्ति का अंकुर है, वह वृक्ष बनकर पुष्पित, पल्लवित और प्रेमी, प्रेम और प्रेमास्पद के तनों के पत्ते और फल बनकर संसार के अनेकानेक भावुक भक्तों के हृदय को अपने दिव्य अनुभवों के रस का आस्वादन और नवपल्लवों की छाया नहीं दे पाएगी। वस्तुत: भक्त अपने को पीछे करके वह भगवान की कृपा को सम्मुख कर देता है। त्रेतायुग में जांबवान जी की लंका जाते समय इसी संभावना के लिए यह कहकर हनुमान जी को किसी भी प्रकार के युद्ध और पराक्रम करने से रोक दिया था। हनुमान जी ने स्वयं अपने बल का उद्घोष करते हुए बोला था -
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलउं नाघउं जलनिधि खारा।।
सहित सहाय रावनहि मारी। आनउं इहां त्रिकूट उपारी।।
कि हनुमान! तुम भले ही रावण का वध करके भी सीता जी को यहां ला सकते हो, पर तुम यह सब मत करना। यह तुमने वह सब कर दिया, जो भगवान को स्वयं करना है तो वह मात्र तुम्हारा पौरुष प्रदर्शन बन जाएगा, जो भगवान की लीला और उद्देश्य दर्शन में अवरोध बनेगा। भक्ति, भक्त और भगवंत कथा के अर्थ को केवल सत्संगी मति ही ग्रहण कर सकती है। सनातन धर्म और भक्तों की दृष्टि से भीष्म पर कोई कलंक नहीं है कि अपने राजकुल की वधू का वस्त्र हरण होता रहा और वे चुप बैठे रहे।
वह तो दुर्योधन के द्वारा की जाने वाली सेवा के प्रति कृतज्ञता और अर्थ की पराधीनता को स्वयं पर इसलिए आरोपित कर लेते हैं कि कहीं मैं अपने पुरुषार्थ बल प्रदर्शन के कारण भगवान की कृपा के प्राकट्य में भक्तों के हृदय में कृष्ण-चंद्र की पूर्णिमा में राहु बनकर ग्रहण न बन जाऊं।
शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा
श्रीकृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा अपने भक्त के पौरुष को उजागर करने के लिए की, क्या वे भीष्म सामान्य भक्त हैं? उन्होंने कहा, हे कृष्ण! आपने मुझे रणक्षेत्र में जिताया है, मैं आपके भक्तों के हृदय में यह सिद्ध करके दिखा दूंगा कि आप अपने भक्तों के प्रति कितनी करुणा रखते हैं। संसार को भौतिक दृष्टि से दिखाई देने वाली एक सामान्य कपड़े की साड़ी में भी आपका वस्त्रावतार करके दिखाऊंगा, आपके अवतार के कारण सीमित नहीं हैं। जैसे सीमाएं आपकी विशालता और अनंतता की तटरक्षक हैं, वैसे ही मैं आपको कपड़े में उत्पन्न करूंगा। प्रह्लाद ने आपको पत्थर में प्रकट किया, वृंदा के लिए आप पत्थर बन गए, अहल्या को पत्थर से नारी बना दिया, समुद्र पार करते समय आप पत्थर बनकर पुल बन गए, गिरिराज पर्वत को एक छोटी अंगुली पर उठा लिया, जब आप किसी भक्त को नहीं डूबने देते हैं तो आज मैं आपके करुणामृत का प्राकट्य करूंगा।
वे धृतराष्ट्र की सभा में परवश जीव की तरह तड़पते से दिखाई देते हैं, पर भीष्म की यह तड़पन भगवान को प्रकट करने का वह कष्ट है, जो मां बालक को जन्म देने के लिए प्रसव पीड़ा को सहन करती है।
प्रत्येक रूप में श्रीकृष्ण की स्तुति
भीष्म ने गणेश, शिव, ब्रह्मा, विष्णु, योगियों के अभीष्ट तुरीय और समाधि प्रकृति प्रत्येक रूप में श्रीकृष्ण की ही स्तुति की है। सूर्य को लगा कि भाई इसी समय हम भी भक्त और भगवान के बीच पहुंचकर उत्तरायण सूर्य होने की अपनी महिमा वृद्धि करा लें और उत्तरायण सूर्य को यह सौभाग्य मिला कि वह अपनी दिव्य दृष्टि से एक भक्त की भगवान में जो निष्ठा होती है, उसके दर्शन कर पाया। सृष्टि के इतिहास में सूर्य और चंद्र का एक साथ मिलन संसार ने पहली बार देखा, जब आकाश में सूर्य श्रीकृष्णचंद्र और भीष्मचंद्र के दर्शन करने आया।
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