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दिल्ली के स्कूल हैं कि मानते नहीं... हाइब्रिड मोड में पढ़ाई का सरकारी आदेश भी प्रदूषण में हांफ रहा

Chikheang 2025-12-18 22:37:32 views 1274
  



रीतिका मिश्रा, नई दिल्ली। राजधानी में बढ़ते वायु प्रदूषण के बावजूद स्कूलों में हाइब्रिड मोड की व्यवस्था जमीनी स्तर पर लागू होती नजर नहीं आ रही है। सरकारी स्कूलों में छठवीं से 11वीं तक की पढ़ाई सामान्य दिनों की तरह पूरी तरह ऑफलाइन संचालित की जा रही है। विद्यार्थी नियमित रूप से स्कूल बुलाए जा रहे हैं और शिक्षक भी रोजाना उपस्थिति दर्ज कराने को मजबूर हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

दिल्ली सरकार ने हाल ही में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए सभी सरकारी और निजी कार्यालयों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों के लिए वर्क फ्राॅम होम अनिवार्य किया है। वहीं, शिक्षा निदेशालय ने भी प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए छठवीं से नौवीं और 11वीं के विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई हाइब्रिड मोड में कराने के निर्देश दिए थे, लेकिन स्कूलों में इन आदेशों का असर लगभग न के बराबर दिखाई दे रहा है।

स्कूलों में न तो विद्यार्थियों की संख्या सीमित की गई और न ही ऑनलाइन पढ़ाई को व्यावहारिक विकल्प के रूप में लागू किया गया। शिक्षकों के लिए भी वर्क फ्राॅम होम की कोई व्यवस्था नहीं की गई। नतीजतन, विद्यार्थी रोजाना स्कूल पहुंच रहे हैं और शिक्षक भी प्रदूषण के बीच नियमित आवाजाही करने को मजबूर हैं।

राजकीय विद्यालय शिक्षक संघ (जीएसटीए) के महासचिव अजय वीर यादव ने कहा कि हाइब्रिड मोड की घोषणा केवल कागजों तक सीमित रह गई है। जब लगभग सभी छात्र ऑफलाइन स्कूल बुलाए जा रहे हैं, तो हाइब्रिड व्यवस्था का कोई औचित्य नहीं बचता।

उन्होंने कहा कि जब विद्यार्थियों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए ऑनलाइन विकल्प दिया गया है, तो शिक्षकों के लिए समान सुरक्षा और राहत की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? उन्होंने कहा कि अधिकांश स्कूलों में न तो शिक्षकों को वर्क फ्राॅम होम की अनुमति दी गई और न ही 50 प्रतिशत उपस्थिति के आधार पर कोई रोस्टर तैयार किया गया।

उन्होंने कहा कि इन सब के पीछे सरकार की ओर से स्पष्ट निर्देश जारी न होना है। सरकार हाइब्रिड मोड कहती है, लेकिन इससे प्रधानाचार्य भ्रमित रहते हैं और विद्यार्थियों को नियमित स्कूल बुलाते हैं उन्होंने कहा कि जब प्रदूषण को लेकर हालात इतने गंभीर हैं, तो हाइब्रिड मोड को सख्ती से लागू क्यों नहीं किया जा रहा और शिक्षकों को इससे बाहर क्यों रखा गया है?

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