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इलाहाबाद हाई कोर्ट का सख्त आदेश: थानों में पहुंचकर CCTV का औचक निरीक्षण करें मजिस्ट्रेट, अवैध हिरासत पर फटकार

cy520520 4 hour(s) ago views 577
  

सांकेतिक तस्वीर।



विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस की अवैध हिरासत में रखने के चलन और मजिस्ट्रेट के आदेश की अवहेलना की प्रवृत्ति पर गंभीर टिप्पणी की है। कहा कि इंस्पेक्टर स्तर के पुलिस अधिकारी, सीजेएम के आदेश की अवहेलना कर रहे हैं, जो जिला न्यायालय में मजिस्ट्रेट के प्रमुख हैं।

हालांकि सीजेएम या कोई भी न्यायिक अधिकारी अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए प्रशासनिक और कार्यकारी अधिकारियों से बहुत ऊपर है। इनकी भूमिका विधायिका और राजनीतिक कार्यकारी (मंत्रियों) के समकक्ष हो सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा है कि जजों की तुलना एडमिनिस्ट्रेटिव और एग्जीक्यूटिव अधिकारियों से नहीं की जा सकती। वे संप्रभु राज्य का काम करते हैं और काउंसिल आफ मिनिस्टर्स या पॉलिटिकल एग्जीक्यूटिव की तरह ही उनकी सर्विस सुविधाएं हैं।  
अचानक थानों में पहुंचकर सीसीटीवी का निरीक्षण करें मजिस्ट्रेट

न्यायालय ने दो पुलिस अधिकारियों एसएचओ व आईओ को सीजेएम के आदेश की अवहेलना करने के लिए अवमानना का दोषी करार दिया है। कोर्ट उठने अर्थात शाम चार बजे तक की हिरासत की सजा सुनाई। साथ ही डीजीपी को इनके खिलाफ कार्रवाई का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति एके सिंह देशवाल ने राशिद उर्फ सानू की एक जमानत अर्जी की सुनवाई करते हुए दिया है।
कोर्ट ने कहा, सीसीटीवी फुटेज को कम से कम छह महीने तक सुरक्षित रखना अनिवार्य होगा

कोर्ट ने कहा, मजिस्ट्रेट अचानक थानों में पहुंचकर सीसीटीवी का निरीक्षण करें कि वह काम कर रहा है अथवा नहीं। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेशों की अनदेखी कानून के शासन पर सीधा प्रहार है। इसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। मामले के अनुसार ललितपुर जिला के सानू उर्फ राशिद ने जमानत अर्जी दायर की थी। सानू के परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उसे 14 सितंबर 2025 को हिरासत में लिया, आधिकारिक गिरफ्तारी 17 सितंबर को दिखाई गई।
आदेश न मानने वाले एसएचओ व विवेचना अधिकारी को कोर्ट उठने तक की अवमानना में सजा

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने कई बार सीसीटीवी फुटेज पेश करने का आदेश दिया, परंतु थाना कोतवाली पुलिस फुटेज उपलब्ध नहीं करा सकी। पुलिस का तर्क था कि कैमरों की स्टोरेज क्षमता सीमित होने के कारण रिकॉर्डिंग स्वतः डिलीट हो गई। कोर्ट ने कहा- थाना प्रभारी और विवेचक ने न्यायिक आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की। अदालत ने दोनों अधिकारियों को कोर्ट उठने तक हिरासत में रखने की सजा सुनाई।
पीड़ित को अवैध हिरासत में रखने के लिए एक लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए

राज्य सरकार को निर्देश दिया कि पीड़ित को अवैध हिरासत में रखने के लिए एक लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए, जिसकी वसूली संबंधित अधिकारियों के वेतन से की जा सकती है। कोर्ट ने याची को सशर्त जमानत देते हुए कहा कि वह बजाज फाइनेंस लिमिटेड को 15 लाख रुपये लौटाने का वचन देगा और अन्य कानूनी शर्तों का पालन करेगा।
जिला स्तर पर मानवाधिकार न्यायालय स्थापित करने के निर्देश

इसके साथ ही कोर्ट ने पुलिस थानों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई निर्देश जारी किए। कहा कि अब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या न्यायिक मजिस्ट्रेट थानों का औचक निरीक्षण कर सकेंगे और पुलिस सहयोग करेगी। कोर्ट ने कहा कि सीसीटीवी फुटेज को कम से कम छह महीने तक सुरक्षित रखना अनिवार्य होगा। साथ ही, हिरासत में हिंसा या अवैध बंदी से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए जिला स्तर पर मानवाधिकार न्यायालय स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के खिलाफ है सर्कुलर

हर थाने में सीसीटीवी कैमरे और फुटेज की स्टोरेज कैपेसिटी ऐसी होनी चाहिए कि वह कम से कम 18 महीने तक रह सके। एक और निर्देश था कि जब तक सीसीटीवी फुटेज को 18 महीने तक स्टोर करने की तकनीक नहीं मिल जाती, तब तक इसे छह माह तक संभालकर रखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि मई 2021 में डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, उत्तर प्रदेश द्वारा जारी एसओपी में फुटेज के रखरखाव का निर्देश दिया गया था, लेकिन पुलिस महानिदेशक के 20 जून 2025 के सर्कुलर में कहा था कि फुटेज को दो से सवा दो महीने तक रखा जाना चाहिए, जो खुद परमवीर सिंह सैनी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है।

कोर्ट ने कहा, आज सीसीटीवी कैमरे का ठीक से रखरखाव न करना यूपी के कई पुलिस स्टेशनों में एक नियमित विशेषता बन गई है, जो उन व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है, जिन्हें पुलिस द्वारा अवैध रूप से हिरासत में लिया गया था।
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