जागरण संवाददाता, भागलपुर। होली को लेकर चारों ओर तैयारी दिख रही है। इसके निकट आने से बाजार में खुदरा विक्रेताओं के साथ साथ ग्रामीणों की खरीदारी शुरू हो गई है। वहीं बाहर रह रहे लोग गांव की ओर आने लगे हैं। फाल्गुन की पूर्णिमा को होली का उत्सव मनाने के लिए चहुंदिशा उत्सवी माहौल है।
इस बार की यह पूर्णिमा खगोलीय और परंपरा का अद्भुत संगम लेकर आ रही है। अग्नि, धूल और रंगों के इस उत्सव में योग-संजोग ऐसा बना है कि होलिका दहन, सुतक और खंडग्रस्त चंद्रग्रहण तीनों एक ही कालखंड में आ विराजे हैं। मानो प्रकृति स्वयं संदेश दे रही हो कि सत्य की ज्योति हर युग में प्रज्ज्वलित रहेगी और भक्ति की आंच से अधर्म की परतें झरती रहेंगी।
बूढ़ानाथ मंदिर के पंडित ज्योतिषाचार्य भूपेश मिश्रा ने बताया कि इस वर्ष 3 मार्च मंगलवार को पूर्णिमा अपराह्न 4:26 बजे तक रहेगी। सूर्योदय से 48 मिनट पूर्व होलिका दहन करना श्रेष्ठ माना गया है। सूर्योदय के बाद कुल परंपरा के अनुसार कुलदेवता पर सिंदूर आरोपण, पातरि आदि का विधान किया जाएगा। बुधवार 4 मार्च को रंगोत्सव मनाया जाएगा।
पंचांग के अनुसार पहले दिन तीन मार्च को धुरखेल खेली जाएगी व संवत जलाया जाएगा तथा दूसरे दिन रंग-गुलाल से होली खेली जानी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भक्त प्रह्लाद की बुआ होलिका उसे गोद में लेकर अग्नि में बैठी, तो अग्नि में न जलने का वरदान होने के कारण वह निश्चिंत थी। किंतु ईश्वर की कृपा से परिणाम उलट गया। होलिका जल गई और प्रह्लाद जीवित रहे। इसी खुशी में लोग होलिका दहन के बाद होली मनाते हैं।
3 मार्च को लगेगा चंद्रग्रहण
ज्योतिषाचार्य के अनुसार 3 मार्च को प्रातः 10 बजे तक पूर्णिमा के समस्त कृत्य संपन्न कर लेने चाहिए, क्योंकि सायं 5:55 से 6:46 बजे तक खंडग्रस्तोदित चंद्रग्रहण रहेगा। यद्यपि उस समय दिन रहने के कारण इसका आरंभ भारत में दृष्टिगोचर नहीं होगा। किंतु ग्रहणयुक्त चंद्र का दर्शन होगा और मोक्ष 6:48 बजे होगा। ग्रहण का सुतक आठ घंटे पूर्व, अर्थात प्रातः 9:50 बजे से लग जाएगा।
फाल्गुन पूर्णिमा के बाद मनेगा नववर्ष
उन्होंने बताया कि होली नववर्ष के आगमन का भी संकेत देती है। फाल्गुन पूर्णिमा के दूसरे ही दिन चैत्र का प्रथम चरण आरंभ होता है, जो भारतीय संवत्सर की नई ऊर्जा का द्योतक है। लोग होलिका की अग्नि में अहंकार की आहुति देकर हंसी खुशी के साथ एकताबद्ध होकर नए साल का स्वागत करेंगे। |